जोश न ठंडा होने पाए, कदम मिलाकर चल, मंजिल तेरे पग चूमेगी, आज नहीं तो कल-जितेंद्र

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मोतिहारी, अशोक वर्मा। हर महीने चतुर्दिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शब्द की गूँज निश्चित रूप से हमारे पूर्वजों की आत्माओं को अपने पराक्रमी वंशजों के ऊपर आशीर्वाद की वर्षा करने के लिए उन्मुख हो रही होंगी, लगभग 5 वर्ष पूर्व के इतिहास को यदि पलटें तो पाएंगे कि कहीं किसी प्रान्त में स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की बैठक आयोजित हुईं, यह समाचार पत्रों के कोने में कहीं दिखाई पड़ जाता था।

आज हर महीने लगभग 23 प्रान्तों में प्रथम रविवार के कार्यक्रमों तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों शहीदों की जयन्तियों, पुण्यतिथियों पर यह गूंज मोटे हेडिंग में इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया में गुंजित हो रही है, इसे हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मस्थली के प्रवास में मिली सूक्ष्म प्रेरणा तथा पराक्रमी भाई बहनों के पुरुषार्थ का प्रतिफल मानते हैं।

कौन, किस संगठन के माध्यम से इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करता है, यह महत्व नहीं रखता है, महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित करने की प्रतिस्पर्धा जाग गई है और अगली पीढ़ी भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गई है। 29 मार्च को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति की युवा मंच के गठन की घोषणा की गई थी, अब अन्य संगठनों ने इसका अनुकरण किया है, प्रसन्नता की बात है।

युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदित्य प्रताप सिंह द्वारा विविध प्रान्तों में जाकर स्वतंत्रता सेनानी शहीद परिवारों की अगली पीढ़ी को संगठित करने का प्रयास सराहनीय है। हमारे कई भाई बहन व्यंगात्मक शैली में पूछते हैं कि 40 महीने से हर महीने प्रथम रविवार दस बजे दस मिनट स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों शहीदों के नाम अभियान चल रहा है।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों शहीदों की जयन्तियां तथा पुण्यतिथियां मनाई जा रही हैं, अब तक कोई उपलब्धि हुई हो तो बताएं? उनसे हमारा नम्र निवेदन है कि असम के द्विजेन्द्र मोहन शर्मा जी, छत्तीसगढ़ के मुरली मनोहर खण्डेलवाल, श्री चन्द्र प्रकाश वाजपेयी, मध्यप्रदेश के डॉ राजा भइया मिश्रा, कृष्णेन्द्र प्रताप सिंह, हरियाणा के कपूर सिंह दलाल जी, उत्तरप्रदेश के राजेश कुमार सिंह, रमेश कुमार मिश्रा, मुन्ना लाल कश्यप, इशरत उल्ला खान तथा महन्थ प्रजापति, उत्तराखंड के देशबन्धु जी, उड़ीसा के सूर्यमणि बिस्वाल, बिहार के अशोक कुमार वर्मा, झारखंड के ओम प्रकाश मांझी जी तथा परमजीत सिंह टिवाना से पूछें कि इन कार्यक्रमों का उनके क्षेत्र में क्या प्रभाव पड़ा है?

हम पुनः नम्र निवेदन करते हैं कि सभी संगठन इन कार्यक्रमों को व्यापक स्तर पर संचालित करना आरंभ करें, फिर देखें कि सरकार कैसे हमारी आवाज को अनसुनी कर पाएगी? अगले महीने 7 जून को प्रथम रविवार है, अभी से सघन जनसंपर्क आरंभ करें और ऐसे आयोजकों की नामावली हमारे पास भेजें, ताकि आगामी राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें सम्मानित किया जा सके।

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