मातृ दिवस पर विशेष : मानव सभ्यता के विकासक्रम में ‘माँ’ का स्थान सदैव सर्वोपरि है, रहा है और रहेगा : DIG

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Live News 24×7 के लिए कैलाश गुप्ता।

मानव सभ्यता के विकासक्रम में ‘माँ’ का स्थान सदैव सर्वोपरि रहा है। मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह एक संस्था है जो निस्वार्थ सेवा, नैतिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक संवर्धन का प्रतिनिधित्व करती है। एक माँ न केवल शिशु का पोषण करती है बल्कि वह प्राथमिक समाजीकरण (Primary Socialization) प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व की आधारशिला रखती है।

अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सामाजिक सौहार्द जैसे गुण माँ के सान्निध्य में ही अंकुरित होते हैं। इस प्रकार एक माँ परोक्ष रूप से एक प्रबुद्ध नागरिक समाज के निर्माण में मौलिक योगदान देती है।

उक्त बातें विश्व मातृत्व दिवस 2026 के शुभ अवसर पर सभी माताओं को सादर नमन एवं मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए रांची रेंज के  केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के उप महानिरीक्षक सुनील कुमार गुप्ता ने कही। श्री गुप्ता ने यह भी कहा एक बालक के जीवन में माँ केवल जन्मदात्री नहीं बल्कि उसकी प्रथम गुरु भी होती है। समाज की संरचना में माँ का योगदान नींव के पत्थर के समान है।

वह न केवल भाषा और व्यवहार सिखाती है बल्कि आने वाली पीढ़ी में उन नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करती है, जो आगे चलकर एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण करते हैं। माँ के सिखाए गए ‘सत्य’, ‘धैर्य’ और ‘सहानुभूति’ जैसे गुण व्यक्ति के चरित्र की रीढ़ बनते हैं।

एक माँ द्वारा प्रदान किया गया सुरक्षा का भाव व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में अडिग रहने की शक्ति देता है। उनका अटूट विश्वास और बिना शर्त समर्थन (Unconditional Support) एक ऐसी मनोवैज्ञानिक ऊर्जा है जो व्यक्ति को जीवन की जटिलताओं से जूझने में सक्षम बनाती है।

डिजिटल युग में बच्चों को तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से जोड़े रखना एक बड़ी जिम्मेदारी है। आधुनिक माताएं अब केवल संरक्षक नहीं बल्कि मित्र और मार्गदर्शक (Mentor) की भूमिका भी बखूबी निभा रही हैं। वे बच्चों को स्वतंत्र विचार रखने और अपनी पहचान बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं, जो एक प्रगतिशील समाज के लिए अनिवार्य है।

माँ के प्रति हमारी कृतज्ञता केवल उपहारों या सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सच्चा सम्मान तब है जब हम उनके विचारों को महत्व दें, उनके स्वास्थ्य और मानसिक शांति का ध्यान रखें और उन्हें वह स्थान दें जिसकी वे हकदार हैं। माँ को केवल एक ‘पारिवारिक इकाई’ के रूप में न देखकर उन्हें एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करना ही इस दिन की वास्तविक उपलब्धि होगी।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि माँ वह शक्ति है जो स्नेह और दृढ़ता के संगम से जीवन को संवारती है। उनके त्याग और समर्पण की गहराई को मापना असंभव है। यदि हम उनके द्वारा स्थापित आदर्शों का लेशमात्र भी अनुसरण कर सकें तो यह उनके प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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