हम समाज को जोड़ने चले थे या तोड़ने? जाति आधारित गणना पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, याचिकाकर्ता को लगाई फटकार

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देश में जाति आधारित जनगणना और समाज के बँटवारे को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद सख्त और दूरगामी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देने वाली एक याचिका को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि हमारा मूल लक्ष्य एक ‘जातिविहीन समाज’ (Caste-free Society) का निर्माण करना था, लेकिन दुर्भाग्य से हम समाज को और अधिक विभाजित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। जस्टिस की पीठ ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए उसे कानून का दुरुपयोग न करने की हिदायत दी।

संविधान की मूल भावना का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान संविधान निर्माताओं के सपनों को याद दिलाते हुए कहा कि आजादी के समय विजन एक ऐसे भारत का था जहाँ जाति की दीवारें न हों। कोर्ट ने अफसोस जताते हुए टिप्पणी की, “आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहाँ हर कदम पर समाज को जातियों में बाँटने की कोशिश हो रही है। क्या हम वाकई उस दिशा में जा रहे हैं जिसकी कल्पना हमारे संविधान ने की थी?” अदालत ने साफ किया कि न्यायिक मंच का इस्तेमाल राजनीतिक या विभाजनकारी एजेंडे को हवा देने के लिए नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता को फटकार और जुर्माने की चेतावनी

अदालत ने याचिका को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार देते हुए कहा कि ऐसी याचिकाओं से न केवल कोर्ट का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि समाज में अनावश्यक तनाव भी पैदा होता है। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, “ऐसी याचिकाओं को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता जो समाज के ताने-बाने को कमजोर करती हों।” हालांकि कोर्ट ने इस बार नरमी बरतते हुए भारी जुर्माना नहीं लगाया, लेकिन भविष्य के लिए स्पष्ट चेतावनी जरूर दी है।

जातिगत राजनीति और अदालती रुख

हाल के दिनों में देश के विभिन्न राज्यों में जाति आधारित गणना की मांग और उसके आंकड़ों पर मचे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट का यह रुख काफी अहम माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि कोर्ट ने इशारों-इशारों में यह संदेश दे दिया है कि आरक्षण और सामाजिक न्याय के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण स्वीकार्य नहीं है। इस फैसले के बाद अब उन संगठनों और राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा जो जाति के नाम पर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

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