अशोक वर्मा
मोतिहारी : मदर्स डे की पूर्व संध्या पर आर्य विद्या पीठ मे हुआ भव्य रंगा रंग सांस्कृतिक आयोजन।आयोजन की प्रस्तुतियो ने एक अविस्मरणीय अनुभव का एहसास कराया ।संदेश समाापन पर सभी माताओं को विद्यालय की ओर से स्मृति-चिह्न भेंट कर किया गया।वही कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुई, जिसे विद्यालय के चेयरमैन डॉ. एस. पी. सिंह, एस. पी. सिंह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. डी. एन. सिंह, तथा आर्य विद्यापीठ की प्राचार्या श्रीमती पारमिता सरकार ने संयुक्त रूप से सम्पन्न किया। दीप प्रज्वलन के पश्चात् वातावरण मंत्रोच्चारों एवं पुष्पवर्षा से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा से भर उठा।विद्यालय के असेंबली हॉल में आयोजित विशेष असेंबली में बच्चों ने माँ के समर्पण को दर्शाने वाली एक अत्यंत भावनात्मक नाट्य प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति ने माँ की सहनशीलता, सेवा और प्रेम के विभिन्न आयामों को स्पर्श किया। मंच पर बच्चों का अभिनय इतना सजीव और प्रभावशाली था कि दर्शकों की आँखें नम हो उठीं। माँ की ममता, उसके संघर्ष और उसके निस्वार्थ प्रेम को समर्पित इस नाटक को देखकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो उठा। बच्चों ने माँ को ‘प्रथम गुरु’ के रूप में नमन करते हुए उनके योगदान को आत्मीयता से सराहा।आर्य विद्यापीठ ब्लॉसम’ के नन्हे-मुन्ने बच्चों नर्सरी, एल. के. जी. और यू. के. जी. के विद्यार्थियों ने अपनी माताओं के साथ मिलकर लार्ड बुद्धा ऑडिटोरियम में विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। इस अवसर पर नृत्य, गीत-संगीत, अभिनय एवं खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। बच्चों द्वारा प्रस्तुत ‘तुझमें रब दिखता है’ गीत पर भावनात्मक नृत्य ने समस्त उपस्थित माताओं को गहराई से छू लिया। तालियों की गड़गड़ाहट और मुस्कुराहटों के बीच इस प्रस्तुति ने एक स्थायी छाप छोड़ी वही आर्य विद्यापीठ स्कूल चेयरमैन डॉ. एस. पी. सिंह ने कहा, “माँ केवल एक रिश्ता नहीं है, वह जीवन की आधारशिला है। माँ ही वह हस्ती है, जिसकी गोद में समाज की बुनियाद रखी जाती है। यदि माँ न होती, तो शिक्षा और संस्कृति की कोई व्याख्या ही नहीं हो सकती थी।” उन्होंने बच्चों से आग्रह किया कि वे अपनी माताओं को केवल प्रेम ही नहीं, सर्वोच्च सम्मान भी दें और उनके जीवन संघर्ष को समझें।वही प्राचार्या पारमिता सरकार ने शिक्षकों और आयोजन समिति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि “आर्य विद्यापीठ बच्चों के शैक्षणिक ही नहीं, नैतिक और सांस्कृतिक विकास के लिए भी प्रतिबद्ध है, और इस दिशा में माताओं की भूमिका अपरिमेय है। माता-पिता विशेष रूप से माताएं बच्चों को जीवन के व्यवहारिक पक्षों से अवगत कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
189
