सक्सेस स्टोरी : कालाजार से जंग में वैश्विक पहचान बना रहीं महिला छिड़काव दल 

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  • जेनेवा सहित अन्य देशों से भी कई लोग आये इनका काम देखने 
  • स्वास्थ्य मंत्री भी कर चुके हैं इन सभी 6 महिलाओं को सम्मानित
  • आर्थिक लाभ और सामाजिक सम्मान पाकर खुश हैं सभी महिलाएं
पटना। पूरे राज्य में कालाजार से बचाव के लिए आईआरएस चक्र चलाया जा रहा है। इस काम में वैसे तो हजारों लोग छिड़काव दल में हैं। पर इनके बीच एक छिड़काव दल ऐसा भी है, जिसने न सिर्फ अपने जिले में बल्कि पूरे राज्य और देश के लिए अनूठी मिसाल पेश की है। उनका प्रयास और साहस महिला सशक्तिकरण और आर्थिक स्वावलंबन का बेहतरीन उदाहरण है। इस छिड़काव दल में छह महिलाएं हैं जो पिछले सात साल से मुजफ्फरपुर जिला के कुढ़नी प्रखंड के 70 राजस्व गाँवों में सिंथेटिक पायरोथॉयराइड का छिड़काव तो करती ही हैं, गांव के लोगों को कालाजार और चमकी बुखार के बारे में समुचित जानकारी देकर जागरूक करने का भी अतिरिक्त प्रयास करती हैं। उनका काम और उनके साहस को देखने जेनेवा सहित कई अन्य देशों के लोग भी समय-समय पर यहाँ आए हैं। वर्ष 2022 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने महिला दिवस के मौके पर इस छिड़काव दल की महिलाओं को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया।
छिड़काव दल में शामिल होने के लिए सीखी साइकिल 
इन महिलाओं के छिड़काव दल में शामिल होने के पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है। इन छह महिलाओं ने छिड़काव दल में शामिल होने के लिए साइकिल चलाना सीखा। क्योंकि यह छिड़कावकर्मी के रूप में चयन के लिए अनिवार्य योग्यता थी। दल की सदस्य शारदा भारती, किरण कुमारी, सुंदेश्वरी कुमारी, वीणा कुमारी, कंचन कुमारी और गुड्डी देवी ने स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनने की चाहत लिए कुछ ही महीने में साइकिल चलाने की योग्यता अर्जित कर ली। वर्ष 2017 के प्रथम राउंड से सभी छह महिलाओं ने छिड़काव दल का काम करना शुरू कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया में “नेपथ्य के अभिनेता” कुढ़नी प्रखंड के कलाकार संजय रंजन और पूर्व प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ धर्मेंद्र कुमार माने जाते हैं जिन्होंने विभागीय अधिकारियों को काफी विश्वास दिलाया था।
18 किलोमीटर के दायरे में देर शाम तक करती हैं छिड़काव 
महिला छिड़काव दल की सीनियर फील्ड आफिसर शारदा भारती बताती हैं कि जब हमलोगों ने काम शुरू किया तो हमारे पास 70 राजस्व ग्राम थे। इसे 60 कार्य दिवसों में पूरा करना होता था। अभी भी लगभग 18 किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले राजस्व गांवों में छिड़काव करने हमलोग जाते हैं। अपने काम से मिली पहचान के कारण देर शाम होने पर भी घर जाने में डर नहीं लगता। रास्ते में मिलने वाले लोग “छिड़काव वाली दीदी” कहकर हालचाल पूछते हैं।
आर्थिक और सामाजिक संपन्नता से खुशहाल हुई जिंदगी
इस महिला छिड़काव दल की कंचन देवी कहती हैं कि दल की सभी महिलाओं ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की है। हम सभी को ऐसा ही काम चाहिए था जिसमें पैसा भी हो और घर भी देख सकें। साइकिल चलाने जैसी कुछ जरूरी आवश्यकताएं थी, जिसे हम छह महिलाओं ने पूरा किया। वे कहती हैं कि एक राउंड में छिड़काव करने पर लगभग 45 हजार रुपए मिल जाते हैं। पैसों से आर्थिक मजबूती आयी तो इस काम से सामाजिक पहचान भी मिली। दल के किसी सदस्य के घर में हमारे काम से किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है। गुड्डी देवी मुस्कुराते हुए कहती हैं, आर्थिक संपन्नता बढ़ी तो दल की दो महिलाओं ने स्कूटी खरीद ली है। बाकी भी देर-सबेर खरीद ही लेंगी।
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