उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच शांति क्यों नहीं लौट पाई? परमाणु हथियार, सैन्य गठबंधन और शीत युद्ध की विरासत ने कैसे बनाए रखा दुनिया के सबसे संवेदनशील सैन्य मोर्चों में से एक?
सात दशक से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप आज भी उस युद्ध की छाया से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है, जिसने 1950 से 1953 के बीच लाखों लोगों की जान ले ली थी। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच 27 जुलाई 1953 को युद्धविराम तो हुआ, लेकिन कोई व्यापक शांति संधि नहीं हुई। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष का औपचारिक समाधान आज भी अधूरा है।
38वीं समानांतर रेखा के आसपास बना डिमिलिटराइज्ड जोन यानी DMZ आज दोनों देशों के बीच एक बेहद भारी सैन्यीकृत बफर क्षेत्र है। नाम भले ही ‘डिमिलिटराइज्ड’ हो, लेकिन इसके दोनों ओर बड़ी संख्या में सैनिक, हथियार और सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। यही क्षेत्र कोरियाई विभाजन की सबसे बड़ी निशानी बन चुका है।
युद्ध की शुरुआत कैसे हुई?
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद कोरिया को 38वीं समानांतर रेखा के आसपास दो प्रभाव क्षेत्रों में बांट दिया गया। उत्तर में सोवियत संघ समर्थित शासन और दक्षिण में अमेरिका समर्थित शासन स्थापित हुआ। धीरे-धीरे दोनों हिस्सों में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं विकसित हुईं।
25 जून 1950 को उत्तर कोरियाई सेना ने दक्षिण कोरिया पर हमला कर दिया और इसके साथ ही कोरियाई युद्ध शुरू हुआ। अमेरिका के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र कमान की सेनाएं दक्षिण कोरिया के समर्थन में उतरीं, जबकि बाद में चीन ने उत्तर कोरिया के पक्ष में बड़े पैमाने पर सैन्य हस्तक्षेप किया।
तीन साल तक चले इस युद्ध में भारी जनहानि हुई और कोरियाई प्रायद्वीप का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। अंततः 27 जुलाई 1953 को युद्धविराम समझौता हुआ और सक्रिय लड़ाई रोक दी गई।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह शांति संधि नहीं थी।
युद्ध रुका, लेकिन शांति स्थापित नहीं हुई
1953 का समझौता एक Armistice Agreement था, जिसका उद्देश्य सैन्य संघर्ष को रोकना था। इसने स्थायी शांति स्थापित नहीं की।
इसी अंतर को समझना बेहद जरूरी है। युद्धविराम का अर्थ है लड़ाई रोकना, जबकि शांति संधि युद्ध की स्थिति को राजनीतिक और कानूनी रूप से समाप्त करने की दिशा में औपचारिक समझौता होती है।
कोरियाई प्रायद्वीप में 1953 के बाद बड़े पैमाने पर युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति समझौता नहीं हो सका। इसलिए आज भी वहां एक तरह की लंबे समय से कायम युद्धविराम वाली स्थिति बनी हुई है।
DMZ क्यों बना दुनिया का सबसे संवेदनशील सीमा क्षेत्र?
युद्धविराम के बाद उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच लगभग 4 किलोमीटर चौड़ा DMZ बनाया गया। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच दूरी बनाए रखना था।
विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र का नाम ‘डिमिलिटराइज्ड जोन’ है, उसके आसपास दुनिया की सबसे भारी सैन्य तैनातियों में से एक मौजूद है।
सीमा के दोनों ओर सैनिक, तोपखाने, मिसाइल प्रणालियां और अन्य सैन्य संसाधन तैनात हैं। DMZ के भीतर और आसपास बारूदी सुरंगों की मौजूदगी भी इसे बेहद खतरनाक बनाती है।
यही कारण है कि किसी छोटी सैन्य घटना या गलत आकलन के भी गंभीर परिणाम होने की आशंका बनी रहती है।
अमेरिका, चीन और रूस की भूमिका क्यों अहम है?
कोरियाई संकट को केवल उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच का विवाद समझना अधूरा होगा। इसके पीछे शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति भी जुड़ी हुई है।
दक्षिण कोरिया का अमेरिका के साथ मजबूत सैन्य गठबंधन है और अमेरिकी सैनिक भी दक्षिण कोरिया में तैनात हैं। दूसरी ओर उत्तर कोरिया के चीन और रूस के साथ ऐतिहासिक एवं रणनीतिक संबंध रहे हैं।
इस वजह से कोरियाई प्रायद्वीप में होने वाली किसी भी बड़ी सैन्य या कूटनीतिक घटना का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता।
परमाणु हथियारों ने बढ़ाई चिंता
पिछले कुछ दशकों में उत्तर कोरिया का परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम इस पूरे विवाद को और ज्यादा गंभीर बना चुका है।
प्योंगयांग लगातार अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करने पर जोर देता रहा है। उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियारों और मिसाइल कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार मानता है, जबकि अमेरिका और दक्षिण कोरिया इसे क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हैं।
इसके जवाब में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा विस्तारित प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने की कोशिशें जारी रहती हैं।
यहीं से एक ऐसा सुरक्षा चक्र बनता है जिसमें एक पक्ष अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य क्षमता बढ़ाता है और दूसरा पक्ष उसे खतरे के रूप में देखते हुए अपनी सैन्य तैयारी बढ़ाता है।
दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया में इतना बड़ा अंतर कैसे आया?
1953 के बाद दोनों देशों ने पूरी तरह अलग विकास मॉडल अपनाए।
दक्षिण कोरिया ने औद्योगीकरण, निर्यात, शिक्षा, तकनीक और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सहारे तेजी से आर्थिक विकास किया। आज वह दुनिया की प्रमुख औद्योगिक और तकनीकी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
इसके विपरीत उत्तर कोरिया ने केंद्रीकृत शासन, सैन्य प्राथमिकताओं और सीमित अंतरराष्ट्रीय संपर्क का रास्ता अपनाया। लंबे समय से उस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी लागू हैं।
इन दशकों में दोनों समाजों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दूरी इतनी बढ़ गई है कि आज किसी संभावित एकीकरण की राह बेहद जटिल दिखाई देती है।
क्या कभी हो सकती है स्थायी शांति?
समय-समय पर उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच बातचीत हुई है। कई ऐतिहासिक शिखर बैठकें भी आयोजित हुईं और दोनों पक्षों ने तनाव कम करने तथा संबंध सुधारने की कोशिश की।
लेकिन परमाणु कार्यक्रम, सैन्य गठबंधन, प्रतिबंध, आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के कारण स्थायी समाधान अभी भी दूर दिखाई देता है।
शांति की राह में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों पक्ष सुरक्षा को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। उत्तर कोरिया अपनी परमाणु क्षमता को शासन और देश की सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है, जबकि दक्षिण कोरिया और उसके सहयोगी इसे खत्म करने की दिशा में दबाव बनाते रहे हैं।
बिछड़े परिवारों का दर्द आज भी कायम
इस राजनीतिक और सैन्य संघर्ष का सबसे मानवीय पहलू उन लाखों परिवारों से जुड़ा है जो कोरियाई विभाजन के दौरान एक-दूसरे से अलग हो गए।
कई परिवार दशकों तक अपने रिश्तेदारों से संपर्क नहीं कर सके। सीमित मानवीय संपर्क और समय-समय पर होने वाली पारिवारिक मुलाकातों ने कुछ लोगों को अपने बिछड़े परिजनों से मिलने का अवसर दिया, लेकिन यह समस्या व्यापक रूप से हल नहीं हो सकी।
एक ही भाषा, साझा इतिहास और सांस्कृतिक विरासत वाले दो समाजों के बीच खिंची यह सीमा आज भी विभाजन की पीड़ा को जीवित रखे हुए है।
1953 का अधूरा अध्याय
कोरियाई युद्ध के सात दशक से अधिक समय बाद भी 1953 का युद्धविराम एक अधूरे अध्याय की तरह मौजूद है। गोलियां बड़े पैमाने पर शांत हैं, लेकिन राजनीतिक और सैन्य तनाव खत्म नहीं हुआ।
उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका-दक्षिण कोरिया का सैन्य गठबंधन और चीन-रूस के साथ बदलते रणनीतिक समीकरण इस क्षेत्र को लगातार संवेदनशील बनाए हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कभी युद्धविराम को स्थायी शांति में बदला जा सकेगा?
फिलहाल इसका कोई आसान जवाब नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है—कोरियाई प्रायद्वीप का संघर्ष केवल दो देशों की सीमा का विवाद नहीं, बल्कि शीत युद्ध की विरासत, परमाणु सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़ा एक ऐसा संकट है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
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