विशेष आलेख द्वारा सुनील कुमार, उप महानिरीक्षक, के.रि.पु. बल
रेंज रांची।
“स्वतंत्रता केवल अतीत का गौरव गान नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी को एक सशक्त, समृद्ध और समावेशी राष्ट्र सौंपने का पवित्र संकल्प है।”
15 अगस्त का यह पावन अवसर हमारे लोकतंत्र की जीती-जागती चेतना और 140 करोड़ हिन्दुस्तानियों के अखंड विश्वास का उत्सव है। आज जिस स्वतंत्र गगन के नीचे हम सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में मां भारती के उन अनगिनत वीर-वीरांगनाओं और हुतात्माओं का त्याग, तपस्या और बलिदान निहित है, जिन्होंने हमारे ‘आज’ के लिए अपना ‘कल’ कुर्बान कर दिया था।
क्रांतियों और संकल्पों का पावन पर्व अहिंसा के मार्ग से लेकर क्रांति की ज्वाला तक—महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अब्दुल हमीद, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई और सरदार पटेल जैसी महान विभूतियों ने हमें सिखाया कि जब 140 करोड़ संकल्प एक दिशा में बढ़ते हैं, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।
1947 में स्वतंत्रता के समय अनेक वैश्विक विशेषज्ञों को भारत के स्थायित्व पर संदेह था, लेकिन भारत की सामूहिक प्रबल इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों ने दुनिया की तमाम आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध कर दिया।
बदलता भारत: वैश्विक पटल पर अमिट छाप आर्थिक महाशक्ति: अभावों के दौर से निकलकर आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष पर खड़ा है।
तकनीक और अंतरिक्ष में डंका: चंद्रयान अभियानों से लेकर डिजिटल इंडिया और UPI क्रांति तक, भारत तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक दिशा तय कर रहा है।
आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम: कृषि से लेकर रक्षा उत्पादन तक, ‘मेक इन इंडिया’ के मंत्र ने राष्ट्र को पूरी तरह स्वावलंबी बनाया है।
नागरिक कर्तव्य: ‘राष्ट्र-प्रथम’ ही एकमात्र मार्ग स्वतंत्रता केवल अधिकारों की गारंटी नहीं देती, बल्कि ‘कर्तव्य पथ’ पर चलने की ज़िम्मेदारी भी सौंपती है। आज जब हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं, तो हमारी प्राथमिकताएँ पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए:
सामाजिक एकता: विविधता में एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र-प्रथम’ को अपनाएं।
समावेशी विकास: विकास की किरणें समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक निर्बाध पहुँचनी चाहिए।
सतत और हरित भविष्य: पर्यावरण संरक्षण को अपनी दैनिक जीवनशैली (LiFE) का हिस्सा बनाना हर नागरिक का दायित्व है।
आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम अपनी पुरानी उपलब्धियों पर संतोष करने के बजाय, नए शिखरों को छूने का संकल्प लें। यह समय केवल आकांक्षाओं का नहीं, बल्कि पुरुषार्थ का है। यदि हम अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखकर कार्य करेंगे, तो ‘विकसित भारत’ का सपना हमारा यथार्थ बनेगा।
जय हिंद! जय भारत!
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