पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद में शुक्रवार को देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष एक चौंकाने वाला प्रशासनिक आंकड़ा सामने आया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक हलफनामा दाखिल करते हुए स्वीकार किया है कि राज्य में मतदाता सूची से नाम काटे जाने और नए नाम जोड़े जाने के फैसलों के खिलाफ दायर 37 लाख से अधिक अपीलें आज भी न्यायिक और प्रशासनिक पटल पर अधर में लटकी हुई हैं। शीर्ष अदालत द्वारा गठित विशेष अपीलीय न्यायाधिकरणों के भारी-भरकम नेटवर्क के बावजूद अब तक कुल दर्ज 38.20 लाख मामलों में से केवल लगभग 1.02 लाख अपीलों का ही अंतिम निपटारा किया जा सका है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की गति और समयबद्धता पर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष दाखिल हुआ हलफनामा: 37.18 लाख अपीलें अभी भी अनसुलझी
निर्वाचन आयोग की ओर से यह तथ्यात्मक रिपोर्ट भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष पेश की गई। पीठ उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से हटाए गए मतदाताओं, उनके दावों और उठाई गई आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार विस्तृत डेटा सार्वजनिक करने की गुहार लगाई गई थी। आयोग द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, एसआईआर आदेशों के विरुद्ध कुल 38,20,683 अपीलें दायर हुई थीं। इनमें से अब तक मात्र 1,02,231 मामलों का निस्तारण हो सका है, जबकि 37,18,452 अपीलें अभी भी फैसलों की प्रतीक्षा में लंबित पड़ी हैं। हालांकि, आयोग ने अपने हलफनामे में यह स्पष्ट वर्गीकरण नहीं दिया है कि इनमें से कितनी अपीलें नाम अनुचित तरीके से हटाए जाने के खिलाफ थीं और कितनी अपीलें फर्जी प्रविष्टियों को मतदाता सूची से बाहर करने की मांग को लेकर दर्ज कराई गई थीं।
गणना चरण में 58 लाख नाम काटने का सनसनीखेज आरोप: याचिकाकर्ता प्रसेनजीत बोस ने उठाए गंभीर सवाल
सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर करने वाले सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रसेनजीत बोस ने एसआईआर प्रक्रिया की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है। बोस के दावों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के डोर-टू-डोर गणना चरण (Enumeration Phase) के दौरान ही एक झटके में 58 लाख से अधिक नागरिकों के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए थे। उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए पीठ को बताया कि औपचारिक दावे और आपत्ति दर्ज कराने की समय-सीमा के भीतर नाम दोबारा शामिल करने के लिए 9.64 लाख से अधिक आवेदन और संदिग्ध नाम हटाने के लिए 99,000 से अधिक आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इसके बावजूद, जब 28 फरवरी को आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया गया, तो उसमें केवल 1.82 लाख नए नामों को ही आधिकारिक मंजूरी मिल सकी। इसके अलावा, चुनाव आयोग के स्वयं के रिकॉर्ड्स दर्शाते हैं कि 17 दिसंबर 2025 के ड्राफ्ट रोल से लेकर 7 अगस्त 2026 के बीच नए मतदाताओं के रूप में शामिल होने के लिए फॉर्म 6 के तहत 34.13 लाख नए आवेदन प्राप्त हुए थे, जो राज्य में बड़े पैमाने पर मताधिकार बहाली की मांग को रेखांकित करते हैं।
समयबद्ध समाधान और अतिरिक्त ट्रिब्यूनल पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
इससे पूर्व 25 अगस्त को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को स्पष्ट आदेश दिया था कि न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित मामलों और उनके निस्तारण की सटीक स्थिति का पूरा कच्चा-चिट्ठा अदालत के सामने रखा जाए। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए रेखांकित किया था कि निष्पक्ष और स्वतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह अनिवार्य है कि नागरिकों के मताधिकार से जुड़ी इन अपीलों का फैसला एक तय समय-सीमा के भीतर हो, न कि अनिश्चितकाल तक टाला जाए। पीठ ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा था कि फाइलों के बढ़ते अंबार को तेजी से निपटाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं और मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए क्या अतिरिक्त न्यायाधिकरणों की स्थापना की आवश्यकता है। इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने 24 अप्रैल को ही अपीलीय प्राधिकरणों को यह साफ हिदायत दी थी कि जिन मतदाताओं ने अपना नाम सूची से अवैध रूप से हटाए जाने के खिलाफ त्वरित सुनवाई की अर्जियां लगाई हैं, उनकी सुनवाई बिना किसी देरी के प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए।
700 न्यायिक अधिकारी और 19 विशेष न्यायाधिकरण: व्यवस्था के बावजूद धीमी रफ्तार
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के तहत उपजे लगभग 60 लाख दावों और आपत्तियों के भारी बोझ से निपटने के लिए एक बड़ा अंतरराज्यीय न्यायिक तंत्र खड़ा किया गया था। चुनावी विवादों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच के लिए पश्चिम बंगाल के स्थानीय न्यायिक तंत्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों ओडिशा और झारखंड से भी करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को विशेष प्रतिनियुक्ति पर तैनात किया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और दिशा-निर्देशों के अनुरूप, कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इन अपीलों के निपटारे के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 विशेष अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन किया था। इसके बावजूद, अब तक केवल 2.6 प्रतिशत अपीलों का ही निस्तारण हो पाना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक संसाधन और न्यायिक गति नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण की विशाल चुनौती के सामने अत्यंत धीमी साबित हो रही है।
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