मांझी बोले- हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर पड़ा, अब वैचारिक चुनौती पर नजर जरूरी

Live News 24x7
7 Min Read

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सलवाद’ वाले बयान पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने जताई सहमति, बोले- बदलते दौर में चुनौती का स्वरूप भी बदला है

नई दिल्ली। देश में नक्सलवाद के मुद्दे पर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हथियारबंद नक्सली गतिविधियों में कमी और वैचारिक स्तर पर सक्रिय ताकतों को लेकर दिए गए बयान पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।

मांझी ने प्रधानमंत्री के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि नक्सलवाद की चुनौती अब पहले जैसी नहीं रही है। उनके मुताबिक सुरक्षा बलों की कार्रवाई से सशस्त्र उग्रवादी गतिविधियों पर काफी प्रभाव पड़ा है, लेकिन विचारधारा के स्तर पर पैदा होने वाली चुनौतियों को भी गंभीरता से समझने की जरूरत है।

नक्सल प्रभावित इलाकों में बदली तस्वीर

पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बलों और सरकार की रणनीति में कई बदलाव देखने को मिले हैं। अभियान के साथ-साथ सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी विकास योजनाओं के विस्तार पर भी जोर दिया गया है।

कई इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ने और लगातार अभियानों के कारण माओवादी संगठनों की गतिविधियों पर असर पड़ा है। बड़ी संख्या में कैडरों के आत्मसमर्पण और कई अभियानों के बाद नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दायरा पहले की तुलना में सीमित हुआ है।

इसी बदलते परिदृश्य को लेकर प्रधानमंत्री ने हथियारबंद उग्रवाद के साथ-साथ वैचारिक प्रभाव को लेकर भी चिंता जाहिर की थी।

मांझी ने बताया क्यों बदल गई चुनौती

जीतन राम मांझी का कहना है कि नक्सलवाद को केवल बंदूक और जंगलों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार किसी भी हिंसक विचारधारा का असर तब तक पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता, जब तक उसके वैचारिक प्रभाव को भी चुनौती न दी जाए।

मांझी ने अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियों का प्रभाव उन्होंने करीब से देखा है। उनके मुताबिक एक दौर में कमजोर और गरीब तबकों को डर, हिंसा तथा प्रचार के जरिए प्रभावित किया जाता था।

अब परिस्थितियां बदलने के साथ इस चुनौती का स्वरूप भी बदल रहा है।

‘दिमागी नक्सलवाद’ को लेकर क्या है बहस?

‘दिमागी नक्सलवाद’ या ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भारतीय राजनीतिक बहस में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। सरकार और कुछ राजनीतिक नेता इन शब्दों के जरिए उन कथित नेटवर्क या विचारधारात्मक गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं, जिन्हें वे माओवादी हिंसा के समर्थन या उसके वैचारिक विस्तार से जोड़ते हैं।

हालांकि, इस शब्द की कोई सर्वमान्य कानूनी परिभाषा नहीं है। किसी व्यक्ति, संगठन, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या अकादमिक को केवल उसके विचारों के आधार पर नक्सली या माओवादी समर्थक कहना भी गंभीर आरोप हो सकता है। ऐसे मामलों में ठोस प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसीलिए ‘वैचारिक चुनौती’ पर बहस करते समय लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

युवाओं और सोशल मीडिया की भूमिका

आज विचारों का प्रसार केवल राजनीतिक मंचों या संगठनों के माध्यम से नहीं होता। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन समुदायों ने सूचना के प्रसार को बेहद तेज बना दिया है।

मांझी के बयान को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। उनका जोर इस बात पर है कि युवाओं को किसी भी विचारधारा या प्रचार को बिना जांचे स्वीकार करने के बजाय तथ्यों को समझना चाहिए और सही-गलत के बीच अंतर करना चाहिए।

विशेषज्ञों के नजरिए से भी किसी भी तरह के उग्रवाद से निपटने के लिए केवल सुरक्षा कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती। शिक्षा, रोजगार, विकास, बेहतर प्रशासन और स्थानीय स्तर पर लोगों का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

सुरक्षा के साथ विकास भी जरूरी

नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय से यह देखा गया है कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां सड़क, स्कूल, अस्पताल, संचार व्यवस्था और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, वहां अलगाववादी और हिंसक संगठनों के लिए प्रभाव बनाए रखना कठिन हो सकता है।

इसी वजह से सरकारों की रणनीति में सुरक्षा अभियान के साथ विकास योजनाओं को भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

क्या खत्म हो गया है नक्सलवाद का खतरा?

नक्सलवाद के खिलाफ अभियानों में सफलता मिलने के बावजूद इसे पूरी तरह समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। किसी भी लंबे समय से चले आ रहे उग्रवादी आंदोलन का प्रभाव केवल उसके हथियारबंद कैडरों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।

सुरक्षा व्यवस्था, स्थानीय असंतोष, आर्थिक परिस्थितियां, राजनीतिक परिस्थितियां और वैचारिक प्रभाव—इन सभी पहलुओं पर नजर रखना जरूरी होता है।

जीतन राम मांझी का बयान इसी बदलती चुनौती की ओर संकेत करता है। उनका मानना है कि हथियारबंद गतिविधियों पर नियंत्रण के साथ वैचारिक स्तर पर भी सतर्कता जरूरी है।

आगे की राह क्या होगी?

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब केवल जंगलों में चलने वाले सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं है। बदलती तकनीक और संचार माध्यमों के दौर में सरकार के सामने चुनौती भी बहुआयामी हो गई है।

एक तरफ हिंसक उग्रवाद पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है, तो दूसरी तरफ लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और आलोचना के अधिकार की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर जीतन राम मांझी की प्रतिक्रिया ने इसी व्यापक मुद्दे को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारें सुरक्षा, विकास और वैचारिक चुनौतियों के बीच किस तरह संतुलन कायम करती हैं।

नोट: इस रिपोर्ट में नेताओं के बयानों और राजनीतिक दावों को उनके संबंधित संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। पाठकों को किसी भी आरोप या राजनीतिक दावे को तथ्य मानने से पहले स्वतंत्र एवं विश्वसनीय स्रोतों से सत्यापन करना चाहिए।

25
Share This Article
Leave a review

Leave a review

Your email address will not be published. Required fields are marked *