पश्चिम बंगाल की चुनावी तैयारियों और वोटर लिस्ट की शुचिता पर एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने न्यायपालिका से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक हड़कंप मचा दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश शाहिद उल्लाह मुंशी का नाम ही पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से गायब पाया गया है। एक पूर्व जज, जिन्होंने दशकों तक कानून की रक्षा की, उनका अपना ही नाम वोटर लिस्ट में न होना राज्य के चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
खुद पूर्व जज भी रह गए दंग, जब लिस्ट में नहीं मिला नाम
पूरा मामला तब सामने आया जब पूर्व न्यायाधीश शाहिद उल्लाह मुंशी ने अपना नाम मतदाता सूची में चेक किया। उन्होंने पाया कि उनका नाम उस लिस्ट से नदारद है जहाँ वे वर्षों से वोट डालते आ रहे थे। इस घटना ने आम आदमी के मन में डर पैदा कर दिया है कि जब एक पूर्व हाई कोर्ट जज का नाम सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की क्या बिसात? पूर्व जज ने इस मामले पर गहरी नाराजगी जताई है और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है।
साजिश या प्रशासनिक लापरवाही? विपक्ष ने घेरा
वोटर लिस्ट से नाम कटने की इस खबर ने बंगाल की राजनीति में भी उबाल ला दिया है। विपक्ष ने ममता सरकार और चुनाव आयोग को आड़े हाथों लेते हुए इसे एक बड़ी साजिश का हिस्सा बताया है। नेताओं का आरोप है कि बंगाल में जानबूझकर चुनिंदा लोगों के नाम लिस्ट से हटाए जा रहे हैं। हालांकि, जिला प्रशासन की ओर से इसे तकनीकी चूक या डेटा अपडेशन के दौरान हुई गलती बताया जा रहा है, लेकिन स्पष्टीकरण से कोई संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है।
क्या कहता है कानून? वोटर लिस्ट से नाम कटना कितना गंभीर?
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नागरिक का नाम बिना उचित वेरिफिकेशन और सूचना के मतदाता सूची से हटाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। खासकर जब मामला एक पूर्व न्यायाधीश का हो, तो यह और भी संवेदनशील हो जाता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस ‘ब्लंडर’ को कैसे सुधारता है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है। इस घटना ने आगामी चुनावों से पहले वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की विश्वसनीयता पर दाग लगा दिया है।
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