पंजाब में पैर पसार चुके नशे के दानव को खत्म करने के लिए अब संसद में एक बेहद चौंकाने वाली और अनोखी मांग उठी है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान केंद्र सरकार से आग्रह किया कि शादियों से पहले दूल्हों का ‘डोप टेस्ट’ (Dope Test) अनिवार्य करने के लिए एक सख्त कानून बनाया जाए। इस प्रस्ताव के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस छिड़ गई है।
आखिर क्यों उठी ‘मैरिज डोप टेस्ट’ की मांग?
पंजाब के फतेहगढ़ साहिब से सांसद अमर सिंह ने सदन में राज्य की एक कड़वी सच्चाई को उजागर किया। उन्होंने कहा कि पंजाब की जवानी नशे की गिरफ्त में है और इसका सबसे बुरा असर बेटियों के जीवन पर पड़ रहा है। कई बार शादी के बाद लड़कियों को पता चलता है कि उनका पति नशे का आदी है, जिससे न केवल घर बर्बाद होते हैं बल्कि मासूम महिलाओं का जीवन नर्क बन जाता है।
सांसद ने तर्क दिया कि यदि विवाह पंजीकरण (Marriage Registration) के समय दूल्हे के लिए डोप टेस्ट की रिपोर्ट अनिवार्य कर दी जाए, तो माता-पिता अपनी बेटियों को गलत हाथों में सौंपने से बच सकेंगे।
पंजाब की जवानी को बचाने के लिए ‘प्रिवेंटिव’ कदम
अमर सिंह ने सदन में जोर देकर कहा कि नशा केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि एक सामाजिक अभिशाप बन चुका है। उन्होंने कहा, “पंजाब में नशे के कारण अनगिनत घर उजड़ रहे हैं। अगर हम कानूनी तौर पर यह प्रावधान कर दें कि शादी के सर्टिफिकेट के लिए मेडिकल क्लीयरेंस जरूरी है, तो इससे युवाओं में डर पैदा होगा और नशे की सप्लाई चेन पर भी दबाव बनेगा।”
क्या है वर्तमान कानून और आगे की राह?
वर्तमान में भारत में विवाह के लिए ऐसी कोई स्वास्थ्य जांच अनिवार्य नहीं है। हालांकि, कुछ सामाजिक संस्थाएं और डॉक्टर पहले से ही एचआईवी (HIV) और अन्य जेनेटिक बीमारियों की जांच की सलाह देते रहे हैं। लेकिन ‘डोप टेस्ट’ को अनिवार्य करने की मांग ने एक नई कानूनी और नैतिक बहस छेड़ दी है। आलोचकों का मानना है कि यह निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है, जबकि समर्थकों का कहना है कि एक बेटी के सुरक्षित भविष्य के लिए यह छोटा सा कदम मील का पत्थर साबित हो सकता है।
विपक्ष और सरकार का रुख
सांसद की इस मांग पर सदन में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। जहां कुछ सदस्यों ने इसे पंजाब की जमीनी हकीकत बताया, वहीं कुछ ने इसके क्रियान्वयन (Implementation) पर सवाल उठाए। अब देखना यह होगा कि क्या केंद्र सरकार इस दिशा में कोई गाइडलाइन जारी करती है या यह मांग केवल बहस तक ही सीमित रह जाएगी।
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