बिहार में फिर सियासी भूचाल नीतीश के राज्यसभा जाने पर भड़के आनंद मोहन, बोले NDA को भारी पड़ेगा यह फैसला

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बिहार की राजनीति में इन दिनों कयासों और बयानों का दौर अपने चरम पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा निर्वाचित होने और दिल्ली की ओर रुख करने की खबरों के बीच, पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन ने मोर्चा खोल दिया है। आनंद मोहन ने नीतीश कुमार के इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे एनडीए (NDA) की सेहत के लिए हानिकारक बताया है। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर बदलाव करना ही है, तो नीतीश के बेटे निशांत कुमार को पूरी ताकत के साथ मैदान में उतारा जाए।

“जनता के विश्वास के साथ धोखा”: आनंद मोहन के 3 तीखे वार

मैंडेट का अपमान: आनंद मोहन ने कहा कि 2025 तक के लिए जनता ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में चुना था। बीच राह में बिहार छोड़कर दिल्ली जाना उन लाखों लोगों के भरोसे को तोड़ना है, जिन्होंने ‘2025 से 30, फिर से नीतीश’ का नारा बुलंद किया था।

बीजेपी और जेडीयू को नुकसान: उन्होंने चेतावनी दी कि इस सियासी फेरबदल की पटकथा लिखने वाले ‘रणनीतिकार’ गलतफहमी में हैं। इसका सीधा नुकसान आगामी चुनावों में भाजपा और जेडीयू को उठाना पड़ेगा।

निशांत कुमार की वकालत: आनंद मोहन ने एक नई बहस छेड़ते हुए कहा कि निशांत कुमार को राजनीति में लाना ही है, तो उन्हें ‘फुल फ्लेजेड पावर’ (पूर्ण अधिकार) दी जाए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ‘डिप्टी सीएम’ का मतलब केवल ‘चुप मुख्यमंत्री’ होता है, जो बिहार के हित में नहीं है।

“चाणक्य” पर साधा निशाना

आनंद मोहन ने बिना नाम लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व (अमित शाह की ओर इशारा करते हुए) पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि बिहार की राजनीति को दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के जरिए चलाने की कोशिश सफल नहीं होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार के साथ उनके पारिवारिक संबंध हैं, लेकिन राजनीतिक फैसलों पर वे चुप नहीं रहेंगे।

क्या बिहार में होने वाला है नेतृत्व परिवर्तन?

नीतीश कुमार के 16 मार्च को राज्यसभा निर्वाचित होने के बाद से ही पटना में हलचल तेज है।

30 मार्च की डेडलाइन: नीतीश कुमार को 30 मार्च तक विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा।

नए मुख्यमंत्री की चर्चा: चर्चा है कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद बिहार में किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी जा सकती है, जिसमें ‘निशांत कुमार’ का नाम भी अब चर्चाओं में आ गया है।

आनंद मोहन के बयान के राजनीतिक मायने:

विशेषज्ञों का मानना है कि आनंद मोहन का यह गुस्सा सवर्ण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत करने और एनडीए के भीतर अपनी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) बढ़ाने की एक कोशिश हो सकती है।

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