मेदांता अस्पताल में ‘डॉक्टर’ या ‘लेडी डॉन’? इलाज के नाम पर बदसलूकी और अवैध वसूली के गंभीर आरोप

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लखनऊ के प्रतिष्ठित मेदांता अस्पताल से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने चिकित्सा जगत और मरीजों के भरोसे को हिलाकर रख दिया है। अस्पताल की डॉक्टर शेफाली पर मरीजों के साथ अभद्र व्यवहार, मारपीट और इलाज में लापरवाही बरतने के गंभीर आरोप लगे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि प्रबंधन सब कुछ जानकर भी खामोश बैठा है, जिससे अस्पताल की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

मरीजों के साथ गाली-गलौज और ‘लेडी डॉन’ जैसा व्यवहार

अस्पताल में इलाज कराने आए पीड़ितों का कहना है कि डॉक्टर शेफाली का व्यवहार एक संजीदा चिकित्सक जैसा कतई नहीं है। आरोप है कि वे मरीजों से सीधे मुंह बात नहीं करतीं और जब कोई मरीज या उनके परिजन इलाज से जुड़ा जायज सवाल पूछते हैं, तो डॉक्टर मारपीट और गाली-गलौज पर उतारू हो जाती हैं। स्थानीय लोग और मरीज अब उन्हें ‘लेडी डॉन’ की संज्ञा देने लगे हैं। हद तो तब हो गई जब यह बात सामने आई कि वह कई बार बिना लिखित प्रिस्क्रिप्शन (पर्चा) दिए ही मरीजों का इलाज करने की जिद करती हैं, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।

प्रबंधन की मिलीभगत और झूठे आश्वासन का खेल

इस पूरे मामले में मेदांता अस्पताल के मैनेजमेंट की भूमिका भी संदिग्ध नजर आ रही है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि जब भी डॉक्टर शेफाली की बदतमीजी की शिकायत उच्च अधिकारियों से की जाती है, तो मैनेजमेंट केवल आश्वासन देकर पल्ला झाड़ लेता है। कई बार मैनेजमेंट ने यह तक कहा कि वे डॉक्टर शेफाली को सेवा से मुक्त कर देंगे, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। ऐसा प्रतीत होता है कि अस्पताल प्रशासन अपनी कमियों को छिपाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

अवैध वसूली और इलाज के नाम पर लूट की शिकायतें

मेदांता अस्पताल पर केवल व्यवहार ही नहीं, बल्कि आर्थिक शोषण के भी आरोप लग रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, अस्पताल में मरीजों से जबरन अवैध वसूली की खबरें आए दिन सुर्खियां बन रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कई बार पेशेंट की स्थिति गंभीर होने के बावजूद इलाज के नाम पर भारी-भरकम रकम वसूलने को प्राथमिकता दी जाती है। अंदर की हकीकत क्या है, यह अभी पूरी तरह सामने नहीं आ पाया है, लेकिन मरीजों के बढ़ते आक्रोश ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। क्या एक बड़े ब्रांड का नाम होने से मरीजों की गरिमा और उनके अधिकारों को ताक पर रखा जा सकता है? यह एक बड़ा सवाल है।

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