मुजफ्फरपुर। बिहार में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) की गंभीर स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के निर्देशानुसार, आगामी 26 मार्च 2026 को मुजफ्फरपुर सहित प्रदेश के सभी जिलों में ‘फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज (एफसीएम)’ थेरेपी अभियान का राज्यस्तरीय शुभारंभ किया जाएगा। यह पहल विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बनकर आई है, जो खून की अत्यधिक कमी के कारण प्रसव के दौरान जोखिम का सामना करती हैं।
आंकड़ों की भयावहता और विभाग की तत्परता:
इस अभियान की आवश्यकता राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के उन चिंताजनक आंकड़ों से महसूस की गई, जिनमें बताया गया है कि बिहार में लगभग 63 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और भी विकराल है, जहाँ 63.9 प्रतिशत महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं। राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक इन आंकड़ों को देखते हुए भारत सरकार के दिशा-निर्देशों पर मुजफ्फरपुर के स्वास्थ्य तंत्र को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया गया है।
जिले में व्यापक तैयारियों का खाका:
अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मुजफ्फरपुर के चिन्हित स्वास्थ्य संस्थानों, जैसे जिला अस्पताल और प्रथम रेफरल इकाई (एफआरयू) में पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। प्रत्येक केंद्र पर कम से कम 20 बेड और आईवी स्टैंड की व्यवस्था अनिवार्य की गई है ताकि मरीजों को उपचार के दौरान किसी असुविधा का सामना न करना पड़े। प्रशासन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए यह भी तय किया है कि प्रथम चरण में चयनित 20 गंभीर रूप से एनीमिक महिलाओं को एम्बुलेंस के माध्यम से अस्पताल लाया जाएगा और उपचार के बाद उन्हें सुरक्षित घर तक पहुँचाया जाएगा।
विशेषज्ञों की निगरानी और आधुनिक तकनीक:
उपचार की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जिले में प्रशिक्षित चिकित्सा पदाधिकारियों और स्टाफ नर्सों की तैनाती की गई है। मुजफ्फरपुर की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रेखा कुमारी और डॉ. स्नेहल जैसे विशेषज्ञ इस पूरी प्रक्रिया की बारीकी से निगरानी करेंगे। उद्घाटन कार्यक्रम को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ज़ूम) के माध्यम से राज्यस्तरीय शुभारंभ का सीधा प्रसारण भी किया जाएगा।
एफसीएम थेरेपी का महत्व:
डीपीएम रेहान अशरफ ने बताया कि चिकित्सकीय दृष्टि से एफसीएम (फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज) एक अत्यंत सुरक्षित और त्वरित आयरन अनुपूरण विधि है। यह उन गर्भवती महिलाओं के लिए वरदान साबित होगी जिनमें आयरन की गोलियों से सुधार नहीं हो पा रहा है या जिनकी गर्भावस्था 34 सप्ताह से अधिक हो चुकी है। मध्यम से गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं के शरीर में यह थेरेपी तेजी से हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाती है, जिससे डिलीवरी के समय होने वाली जटिलताओं में भारी कमी आने की संभावना है। स्वास्थ्य विभाग ने “एनीमिया मुक्त बिहार” के संकल्प को साकार करने के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को 26 मार्च को सुबह 10 बजे अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
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