- एक अद्भुत महान व्यक्ति दादा लेखराज जिनके तन का आधार स्वंय परमात्मा ने लिया और ब्रह्मा नाम देकर उनसे लाखों आत्माओ मे शक्ति भरी और सतयुग के योग्य बनाया।
अशोक वर्मा
मोतिहारी : भारत की भूमि को देवभूमि कहा गया है, भारत की भूमि पर शिवरात्रि मनाया जाता है ,आज भी लोगों को विश्वास है कि आबू पर्वत पर दिखते छाप देवताओं के विचरण की है उनके पैर की निशानी है। सर्व शास्त्र शिरोमणि गीता ग्रंथ में परमात्मा ने बताया है कि जब-जब धर्मग्लानि होती है तब -तब धरा पर मै अवतरित होता हूं और धर्म की स्थापना करता हूं। इन बातों को चरितार्थ करते हुए 1936 में अविभाजित भारत के सिंध प्रांत निवासी हीरे जवाहारात और सोने के व्यापारी दादा लेखराज नामक व्यक्ति के तन मे परमपिता परमात्मा का अवतरण हुआ । वे अति धर्म परायण थे और 12 गुरु किए थे,वे नियमित गीता पाठी थे,गीता ग्रंथ से उनका इतना प्यार था कि गीता ग्रंथ को छोटे आकार में लाकेट बनाकर उसे गले में लटकाये रखते थे।वे नारायण के परम भक्त थे ,और घर में ही सत्संग करते थे ,1936 में उनमें बड़ा परिवर्तन हुआ ,वे अचानक बिल्कुल शांत चित्त रहने लगे, व्यवसाय से भी धीरे-धीरे कम लगाव होने लगा, घर में ही नियमित होनेवाले सत्संग मे अधिक समय देने लगे। घर से बाहर उनका आना-जाना बहुत कम हो गया ।घर के ही सदस्य उनके पास सत्संग मे बैठ सत्संग करते थे ।एक दिन वे सत्संग में बैठे थे और अचानक अपने को असहज महसूस करने लगे ।वे सत्संग से उठकर अपने कमरे में चले गए ।जब बहुत देर हो गया वे नहीं निकले तो लोगों को उत्सुकता हुई और लोगों ने अंदर जाकर देखा तो उनके मुख से शिवोहम शिवोहम उच्चारित हो रहा था और आंखों से लाल लाल तेज रोशनी निकल रही थी।इस अजूबे दृश्य को बहुतों ने देखा। बाद में जब वे सामान्य हुये तो पूछे कि वह कौन था ? मुझे क्या हुआ था? अपने निर्धारित समय पर ज्योति बिंदु स्वरूप परमपिता परमात्मा शिव बाबा का निर्धारित दादा लेखराज के तन में अवतरण हुआ था। शिव बाबा ने विनाश और स्थापना का दृश्य उनको दिखाकर पक्का निश्चय कराया।परमात्मा ने दादा लेखराज के खोज को मंजिल दिया और अंदर के वैराग्य को जागृत किया ।दादा लेखराज का नाम स्वयं परमात्मा ने ब्रह्मा रखा और नई सतयुगी दुनिया बनाने की जिम्मेदारी उन्हें दी। ब्रह्मा बाबा के चेहरे में बहुतों को कभी श्री कृष्णा तो कभी श्रीनारायण का साक्षात्कार होने लगा ।और यह बातें पुरे क्षेत्र में फैल गई। शहर के उनके सगे संबंधी काफी संखया वहां आने लगे और इस तरह से ओम मंडली की स्थापना हुई। ओम मंडली में ओम के विशेष प्रतिकंपित ध्वनि के उच्चारण के साथ नियमित सत्संग होने लगा । सत्संग में धीरे धीरे काफी लोग आने लगे , बड़े-बड़े घरों की माताएं बहने भी आने लगी ।कईयो ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा कि ऐसा लगता था कि कोई खींच रहा है और हम लोग खींचे हुए यहां आ जा जाते थे।।इस बीच राधे नाम की एक 17 वर्षीय कन्या का भी आगमन सत्संग में हुआ और एक झटके में उसने बाबा को कहा कि मैं तो इस पीतांबर धारी की राधे हूं और वह संस्था मे समर्पित हो यज्ञ माता बन गई। वर्तमान दौर जहां उपभोक्तावादी संस्कृति का बोलबाला है एवं धर्म ग्लानि चरम पर है ,दुनिया पूरी तरह अशांत हो चुकी है, धन ,वैभव और सुख के साधन काफी बढे हैं लेकिन मनुष्य के अंदर परमात्मा की खोज की प्रवृत्ति लंबे समय से रही है वह आज भी बरकरार है, उन्हें मंजिल नहीं मिल पा रही है ।यद्यपि संस्था के स्थापना हुये 90 वर्ष हो चुके हैं और ईश्वरीय आदेश और निर्देशानुसार 1950 में कराची से संस्था का हस्तांतरण राजस्थान के आबू पर्वत पर हुआ । संस्था को स्वयं परमपिता परमात्मा ब्रह्मा तन का आधार लेकर चला रहे हैं इसलिए बहुत व्यवधान होने के बावजूद भी संस्था आगे बढ़ती रही। संस्था का मुख्य उद्देश्य मूल्यों को पुनर्स्थापित करना है क्योंकि आज विश्व मूल्य विहीन हो चुका है।आज दुख ,अशांति ,डिप्रेशन और टेंशन दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। लोग मंजिल की तलाश में बेतहाशा इधर-उधर भागे फिर रहे हैं, लेकिन दुनिया के इस बेचैनी को संस्था समझ रही है ।संस्था समाधान की दिशा मे कार्यरत है।संस्था यह समझती है कि दुख अशांति तनाव डिप्रेशन का मुख्य कारण जन्म मरन के चक्कर मे आने से आत्माओ की शक्ति का कमजोर होना है।समाधान स्वरूप सहज राजयोग का मुफ्त अभ्यास कराया जाता है।आज इस सेवा के बदौलत ही संस्था विश्व भर में फैल चुकी हैं। सेवाकेंद्र मे कोई भी व्यक्ति आकर सुख शांति की अनुभूति कर सकता है।संस्था के फाउंडेशन में तो बहुत आलोचना हुई ,होना भी चाहिए क्योंकि नया ज्ञान था और इस ज्ञान में बुराइयों से संन्यास करने की बात कही गई थी,गीता ग्रंथ मे बताये गये काम महा शत्रु को दुहराया जाता था। ब्रह्मा बाबा ने घर गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र रहने की बात बताई थी, ब्रह्मा बाबा ने निरंहकारिता का संदेश अपने स्वरूप और कर्म से दिया था, उन्होंने बेहद का सन्यासी बनने को कहा था, पलायन की बात उन्होंने नहीं कही थी ,घर गृहस्ती में रहकर कमल पुष्प सामान बनने की बातें कही थी। जिस नारी को उस दौर में नरक का द्वारा एवं पैरों की जूती कहा जाता था, ब्रह्मा बाबा ने नारी को सम्मान दिया, वंदे मातरम कहा। जंगलों में पलायन की बाते नहीं कही। नया ज्ञान और पवित्रता के नाम पर काफी लोगों का विरोध हुआ था परंतु ब्रह्मा बाबा साक्षी दृष्टा बन सब देखते रहे ।परिणामस्वरूप यह संस्था वर्तमान समय बट वृक्ष बन चुकी है तथा विश्व के लगभग 150 देशो में भारत के आध्यात्मिक ज्ञान प्रकाश को फैला रही है । संस्था का आधार ही पवित्रता और चरित्र निर्माण है । विश्व भर मे भारत का प्राचीन सहज राजयोग का अभ्यास संस्था द्वारा कराया जा रहा है। विश्व मे एकमात्र यह ऐसी आध्यात्मिक संस्था है जिसका नेतृत्व नारी शक्ति के हाथों में है । दादा लेखराज अपने जीवन भर की गाढी कमाई को संस्था के स्थापना में समर्पित कर दिया। और सारी संपत्ति आठ माताओ के नाम ट्रस्ट बनाकर उनके चरणों में समर्पित कर दिया। वर्तमान समय महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदि मुर्मू ब्रह्माकुमारी से जुडी है तथा एक दर्जन से अधिक राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री भी संस्था से जुड़े हुए है। संस्था के बारे में देश के बड़े-बड़े आला अधिकारियों का कहना है कि इतनी शक्ति एवं धन के बदौलत प्रशासन चरित्र निर्माण नही करा पा रही है , उस कार्य को ब्रह्माकुमारी संस्था सहज रूप मे करा दे रही है। आज देश के अंदर 15 लाख से अधिक संख्या में लोग नियमित सहज राजयोग का अभ्यास कर रहे हैं तथा करोड़ों लोग संस्था के फॉलोअर बन चुके हैं, संस्था के क्रियाकलापों का उनके जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ रहा है।गृहस्थ एवं समर्पित जीवनशैली पर संस्था में कहीं से भी कोई पाबंदी नहीं है। आज 60,000 बहन एवं भाई संस्था में जीवन दान कर चुके हैं उन्हें समर्पित कहा जाता है और वे देश-विदेश के विभिन्न सेवा केन्द्रो का संचालन कर रहे हैं। संस्था सिर्फ सहज राजयोग एवं ईश्वरीय पढ़ाई तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस मार्ग से जुड़े भाई बहनों के अंदर जो शक्ति का प्रवाह हुआ या संचय हुआ है उसके बदौलत संस्था आज 20 प्रभागों के द्वारा आध्यात्मिक सशक्तिकरण का कार्य कर रही है ।20 प्रभागो में ज्यूडिशरी ,मीडिया, एजुकेशन, इंजीनियरिंग, मेडिकल, कृषि, शिक्षा , वैज्ञानिक ,महिला,राजनीतिक आदि है। संस्था के समर्पित भाई बहनों की सेवा एवं अध्यात्मिक शक्ति से आज पुरा विश्व प्रभावित है,आम लोगों में यह चर्चा भी है कि आखिर संस्था के फाउंडर दादा लेखराज में कौन सी वह विशेषता रही जिससे यह संस्था आज विश्व की एक बड़ी संस्था बन चुकी है ।यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है लेकिन एक ऐसा रहस्य है जिस पर आम लोग जल्दी विश्वास करेंगे क्योंकि उन्हें प्रमाण चाहिए। इस संस्था को स्वयं भगवान चला रहे हैं यह बहुत बड़ी बात है,लेकिन सच है। प्रत्यक्ष भगवान द्वारा संचालन के नाम पर आम दुनिया वालो मे प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है । लेकिन इस सच का प्रमाण संस्था के किसी भी सेवा केंद्र में कोई भी व्यक्ति जाकर वहां देख सकता है और समझ सकता है। अदृश्य शक्ति का एहसास उसे निश्चित होगी। इसके अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय माउंट आबू के डायमंड हॉल मे जहां एक साथ तीस हजार लोग इकट्ठे बैठकर राजयोग का अभ्यास और परमात्म मिलन करते है वह डायमंड हॉल शक्ति स्थल और तीर्थ बन गया है।लेकिन वहा कोई भी व्यक्ति डायरेक्शन देने वाला नही दिखता है।वहा ईश्वरीय अदृश्य शक्ति का एहसास कोई भी व्यक्ति कर सकता है । संस्था से जुड़े हुए भाई-बहन इस रहस्य को जानते हैं । वहां जाने की प्रक्रिया सहज है। सेवाकेंद्र द्वारा मुफ्त पंजीकरण होता है। संस्था का एक मिशन है मानव कल्याण। और सहज राजयोग का अभ्यास एवं ईश्वरीय पढ़ाई से आत्मा को सशक्त कर सतयुग में पार्ट बजाने के योग्य बनाना। यह कार्य स्थापना के समय से ब्रह्मा बाबा अपने चयनित और अडॉप्टेड बच्चों के माध्यम से कर रहे हैं ।उनका जीवन बिल्कुल पारदर्शी था तथा वे सर्वगुण संपन्न थे ।ब्रह्मा बाबा में कभी भी किसी ने जरा भी गुस्सा नहीं देखा। वे किसी बात की समझानी भी बहुत सहज रूप से देते थे। बिल्कुल निरंहकारी थे। उनका मुख्य स्लोगन था निराकारी निरंहकारी एवं निर्विकारी। उनका जीवन शैली ही उनका संदेश था। परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने नई दुनिया निर्माण के लिए ब्रह्मा बच्चों के समक्ष एक- मॉडल के रूप में ब्रह्मा बाबा एवं मम्मा को दिया और इन समान बनने की उन्होंने प्रेरणा दी। और आज 9 लाख आत्माएं लगभग अगले पार्ट के लिए तैयार हो चुकी है और नई दुनिया के लिए सक्षम हो चुकी हैं ।परमपिता परमात्मा ने अवतरण के साथ ब्रह्मा बाबा पर जिस तरह से नई दुनिया निर्माण की जिम्मेदारी दी आज ब्रह्मा बाबा उस जिम्मेवारी का निर्वहन करते आ रहे हैं और अभी सूक्ष्म वतन से अंतिम शिव की बाराती होने के लिए बच्चो के सूक्ष्म ते सूक्ष्म कमी कमजोरी को समाप्त कर उसे संपूर्ण बनाने की दिशा मे कार्यरत हैं। सरकार लोक मे ब्रह्मा बाबा 18 जनवरी 1969 को संपूर्णता को प्राप्त कर सूक्ष्म वतन चले गये और वहा रूके हुये है।वे आगे संस्था के कार्य को अंतिम अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।अब शीघ्र ही भारत स्वर्ग बनने जा रहा है। परमात्मा स्वरूप शब्द का इस्तेमाल बराबर कर रहे है । बाबा ने विभिन्न मुरलियो में कहा है कि जिस तरह स्थापना के समय साक्षात्कार हुआ था उसी तरह अंतिम समय आप ब्राह्मण बच्चों के चेहरे, चलन,दिव्यता एवं स्वरूप में दुनिया वालों को साक्षात्कार होगा। जैसे-जैसे बच्चे संपूर्णता को प्राप्त करेंगे उनके चेहरे चलन एवं कर्म में परमात्मा की झलक दिखाई देगी और उनकी बातों का प्रभाव सभी पर पर पड़ेगा । 1936 में स्थापना के समय परमात्मा ने नई दुनिया निर्माण हेतु आत्माओं को सशक्त होने का 100 वर्ष समय निर्धारित किया था । उस 100 वर्षो के लीप युग को पुरुषोत्तम संगम युग कहा गया। निर्धारित समय से 90 वर्ष निकल चुके हैं और अब मात्र 10 वर्ष का शेष समय बचा हुआ है।स्थापना के समय साक्षात्कार मे विनाश का जो दृश्य परमात्मा ने दिखाया था वह दृश्य आज विश्व मे चारों तरफ दिख रहा है। जिस तरह मनुष्य का जीवन इस ईश्वरीय मिशन से जुटते ही पुराने विकारी दुनिया से विमुख हो जाता है यानि पलट जाता है वैसा ही विश्व परिवर्तन का दृश्य अब दिख रहा है। यह मूल्य और कला विहीन दुनिया जो पांच विकारों रूपी रावण के कैद में पूरी तरह जकड़ चुकी है अब नई दुनिया नया सूर्योदय जो सतयुगी स्वरूप में होगा काफी नजदीक है।ब्रह्मा बाबा ने ब्रह्माकुमारी संस्था बनाकर जिस संकल्प और उद्देश्य को लेकर 90 वर्ष पूर्व सेवा आरंभ किया आज उसके संपूर्ण होने का समय आ चुका है ।पवित्र नई देवी देवताओं की दुनिया शीघ्र आरंभ होने वाली है।
36
