आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय माना जाता : डॉ मनीष पंकज मिश्रा

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गया।भारत के राजनीतिक इतिहास में 25जून 1975आपातकाल काला दिवस के रूप मे भाजपा किसान मोर्चा कार्यालय में मनाया गया इस आंदोलन के प्रमुख नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के चित्र पर माला पुष्प चढ़कर आपातकाल के विरोधी नायक के रूप में उनके चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के सह प्रभारी डॉ मनीष पंकज मिश्रा ने कहा (1975-1977) एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद घटना है। यह अवधि 25 जून 1975 को शुरू हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की अनुशंसा पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए, मीडिया पर सेंसरशिप थोप दी गई, और विपक्षी नेताओं सहित हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। आपातकालीन का विरोध पूरे देश में जेपी आंदोलन के द्वारा किया गया है । गया जी के पावन धरती पर आंदोलनकारी पर गोली भी चलाया गया  जो गया के जनता भूल नहीं सकता है कितने निहत्था लोगों पर  लोग गोलीमार का हत्या कर दी गई थी लेकिन गया के नौजवानों एवं छात्रों के द्वारा दमनकारी रवैया को विरोध किया दमनकारी नीति अपनाकर  सैकड़ो नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था  और देश में विपक्षी दलों की आवाज को दबाने के लिए देश में हिटलर शाही लागू करने के लिए 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगाय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने के बाद यह स्थिति उत्पन्न हुई थी, जिससे उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई थी।इस अवधि में संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से कई बदलाव किए गए, जिनमें प्रधानमंत्री की शक्ति बढ़ाना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करना शामिल था। इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अधिवक्ता ने कहा संपूर्ण देश में आंतरिक विरोधों को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए गए, जिसमें राजनीतिक विरोधियों का दमन और नागरिक अधिकारों का हनन शामिल था। प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना और मनमानी गिरफ्तारी इस दौर की  प्रथम विशेषताएं थींआपातकाल की 21 मार्च 1977 को हुई है, जब इंदिरा गांधी ने आम चुनाव कराने का निर्णय लिया। जनता पार्टी के नेतृत्व में विपक्ष ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। आपातकाल के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव आए, और इस घटना ने लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्वपूर्णता को पुनः स्थापित किया है।आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय माना जाता है। इसने न केवल सत्ता और राजनीति के जटिल समीकरणों को उजागर किया, बल्कि इसने यह भी सिखाया कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों का महत्व कितना अधिक होता है। आज के कार्यक्रम में जिला उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अधिवक्ता सहित दर्जनों लोग ने शामिल हुए हैं
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