दर्द के हाथीपाँव पर भारी पड़ा हौसलों का प्रहार: मुजफ्फरपुर के गाँवों में खामोश क्रांति

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  • जब मरीजों ने ही थाम लिया एक-दूसरे का हाथ, तो हारने लगा फाइलेरिया
मुजफ्फरपुर। 31 सालों का एक लंबा वक्त, शरीर पर भारी बोझ और समाज की चुभती निगाहें। मुरौल प्रखंड के विष्णुपूर बखरी गाँव के विनोद महतो के लिए उनका अपना ही वजूद एक सजा बन चुका था। हाथीपाँव यानी फाइलेरिया ने न केवल उनके शरीर को तोड़ा, बल्कि उनके परिवार को आर्थिक तबाही के मुहाने पर खड़ा कर दिया। लेकिन आज उसी मुजफ्फरपुर की गलियों में एक खामोश क्रांति आकार ले रही है। यह बदलाव आया है सीएचओ लीड पीएसपी मॉडल के जरिए, जिसने दशकों से बंद घरों में कैद मरीजों को एक नया आसमान दिया है।
​इस पूरी मुहिम की धुरी हैं कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स यानी सीएचओ, जिनके नेतृत्व में पेशेंट सपोर्ट पेशेंट ग्रुप यानी पीएसपी का गठन किया गया है। बोचहाँ प्रखंड के मझौलीया स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात एएनएम रिंकी कुमारी बहुत ईमानदारी से स्वीकार करती हैं कि इस मॉडल ने स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति उनके नजरिए को पूरी तरह बदल दिया। रिंकी का कहना है कि पहले उन्हें खुद भी इस बीमारी के सटीक प्रबंधन की गहराई से जानकारी नहीं थी, लेकिन जब सीएचओ के मार्गदर्शन में समूह बने और प्रशिक्षण का दौर शुरू हुआ, तो स्वास्थ्य केंद्रों की तस्वीर बदल गई। अब हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स पर सन्नाटा नहीं रहता, बल्कि वहां लोग अपना हक मांगने और एमएमडीपी किट के जरिए अपना उपचार सीखने पहुँच रहे हैं।
​विष्णुपूर बखरी के विनोद महतो और उनकी पत्नी अनीता देवी की कहानी इस मानवीय संघर्ष का सबसे भावुक हिस्सा है। जहाँ विनोद इकतीस वर्षों से इस पीड़ा को झेल रहे हैं, वहीं उनकी पत्नी पच्चीस वर्षों से इसी जद्दोजहद में हैं। मजदूरी के चंद रुपयों से परिवार पालना और साथ ही बीमारी के इलाज के लिए कर्ज के दलदल में फँसना उनकी नियति बन गई थी। विनोद बताते हैं कि जब वे सीएचओ के नेतृत्व वाले इस समूह से जुड़े, तो उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि सही साफ-सफाई और व्यायाम के जरिए इस सूजन को नियंत्रित किया जा सकता है। आज यह दंपत्ति न केवल अपना ख्याल रख रहा है, बल्कि ब्लॉक के अन्य प्रभावित लोगों का हाथ थामकर उनके दिव्यांगता प्रमाणपत्र और सरकारी पेंशन के आवेदनों में मदद कर रहा है।
सामाजिक ​विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब मरीज खुद एक शिक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका में आता है, तो समाज में फैला डर और कलंक खत्म होने लगता है। डॉक्टर यादव जैसे विशेषज्ञों के अनुसार, सीएचओ लीड पीएसपी मॉडल की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि इसने मरीजों को आत्मविश्वास से भर दिया है। अब ये मरीज केवल सेवा लेने वाले नहीं रहे, बल्कि वे स्वास्थ्य व्यवस्था के एक मजबूत स्तंभ बन गए हैं। दस से सत्ताईस फरवरी के बीच चलने वाला मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एमडीए अभियान अब केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह विनोद जैसे हजारों लोगों के सामूहिक संकल्प का इम्तिहान है। मुजफ्फरपुर के गाँवों से शुरू हुई यह गूँज अब यह संदेश दे रही है कि फाइलेरिया के खिलाफ जंग अब अस्पतालों की फाइलों से निकलकर लोगों के हौसलों में बस चुकी है।
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