कालाजार के चंगुल से मौत को हरा लाई चाँदनी: सरकारी अस्पताल बना डूबते का सहारा

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मोतिहारी :”निजी चिकित्सक ने जब कहा कि पौने दो लाख का प्रबंध करो तभी उपचार शुरू होगा, तो मुझे अपनी बेटी के चेहरे में साक्षात मौत नजर आने लगी थी। हम जैसे दिहाड़ी मजदूर के लिए इतनी बड़ी राशि एक सपने के समान है। मैं हार चुका था, लेकिन मेरी बेटी कालाजार से लड़ना चाहती थी।” मोतिहारी के तुरकौलिया प्रखंड के सपही गाँव निवासी लालबाबू मांझी जब ये बातें बताते हैं, तो उनकी वाणी में उस समय की लाचारी स्पष्ट झलकती है।
यह कहानी दस वर्षीय चाँदनी की है, जिसने वर्ष 2024 में कालाजार जैसी घातक बीमारी से वह युद्ध लड़ा जो उसे भीतर से खोखला कर रहा था।
जब टूटने लगा साहस:
वर्ष 2024 के प्रारंभ में जब शीत ऋतु विदा ले रही थी, चाँदनी को हल्का बुखार रहने लगा। लालबाबू ने इसे साधारण समझकर स्थानीय स्तर पर कई जगह दिखाया, किंतु बुखार नहीं उतरा। सप्ताह बीतते गए, चाँदनी का शरीर सूखने लगा, भूख समाप्त हो गई और उसका मुख पीला पड़ने लगा। सबसे भयावह दृश्य यह था कि उस अबोध बच्ची का पेट कालाजार के कारण असामान्य रूप से फूलता जा रहा था।
हताश पिता उसे गनौली के एक निजी अस्पताल ले गए। वहाँ जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा – “इसे कालाजार है।” साथ ही एक ऐसा खर्च का लिस्ट  थमा दिया जिसने लालबाबू के होश उड़ा दिए। निजी संस्थान में उपचार का खर्च 1 लाख 80 हजार रुपये बताया गया। बिना पैसे के उपचार असंभव था। लालबाबू अपनी बेटी को लेकर मौन भाव से घर लौट आए, यह मानकर कि अब सब नियति के हाथ में है।
कालाजार के विरुद्ध सरकारी तंत्र की मुस्तैदी:
निराशा के उस गहन अंधकार में आशा कार्यकर्ता नेरातून एक नई किरण बनकर सामने आईं। उन्होंने जब माता-पिता को विलाप करते देखा, तो तुरंत स्थिति संभाली। नेरातून जानती थीं कि कालाजार प्राणघातक है, किंतु इसका निःशुल्क और सटीक उपचार सरकारी व्यवस्था में उपलब्ध है। उन्होंने बिना विलंब किए परिवार को तुरकौलिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चलने को मनाया।
वहाँ उनकी भेंट स्वास्थ्य कर्मी ओमकारनाथ से हुई। जाँच में कालाजार की पुष्टि होते ही सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ और 10 मई 2024 को रोगी वाहन (एम्बुलेंस) के माध्यम से चाँदनी को मोतिहारी सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
तीन दिन का उपचार और नया जीवन:
सदर अस्पताल में चिकित्सकों की विशेष देखरेख में चाँदनी का कालाजार के विरुद्ध उपचार आरंभ हुआ। जिस उपचार के लिए निजी संस्थान लाखों की मांग कर रहे थे, वहां वह पूरी तरह निःशुल्क संपन्न हुआ। औषधियों के साथ-साथ उचित देखभाल का प्रभाव दिखने लगा और मात्र तीन दिनों के भीतर चाँदनी की स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ। 13 मई 2024 को जब चाँदनी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो लालबाबू की आँखों में हर्ष के आंसू थे। जिस बेटी के जीवित बचने की आशा उन्होंने त्याग दी थी, वह कालाजार को मात देकर घर लौट रही थी।
कालाजार से मुक्ति के बाद की सुखद तस्वीर:
आज जनवरी 2026 है। चाँदनी अब केवल स्वस्थ ही नहीं है, बल्कि वह अपने टोले की सबसे ऊर्जावान बच्ची है। वह खेलती है और पाठशाला जाती है। सरकार ने न केवल उसका निःशुल्क उपचार किया, बल्कि पोषण के लिए उसे 7,100 रुपये की प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की।
तुरकौलिया के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अर्जुन गुप्ता बताते हैं, “चाँदनी का प्रकरण हमारे लिए एक उदाहरण है। कालाजार प्रभावित क्षेत्रों में, विशेषकर महादलित बस्तियों में, हम लगातार निगरानी रखते हैं। हमारा उद्देश्य केवल उपचार करना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना है कि कालाजार से डरना नहीं, बल्कि लड़ना है और सरकारी अस्पताल पर विश्वास रखना है।”
अब सपही गाँव का वह ‘मांझी टोला’ कालाजार के प्रति पूर्णतः जागरूक हो चुका है। लालबाबू और उनकी पत्नी अब गाँव के स्वास्थ्य दूत बन गए हैं। वे किसी के भी घर में ज्वर की आहट सुनते हैं, तो उसे निजी दुकानों पर नहीं, बल्कि सीधे सरकारी स्वास्थ्य केंद्र जाने की सलाह देते हैं। चाँदनी की मुस्कान आज इस सत्य की साक्षी है कि यदि सही समय पर सही परामर्श मिल जाए, तो कालाजार का अंत निश्चित है।
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