जगदम्बा सरस्वती- स्मृति दिवस पर दूरान्दशी-विशाल हृदया के साथ रूहानियत की प्रतिमूर्ति बन गई : सारिका वर्मा

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 गया।प्रजापिता ब्रह्माकृमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रथम अध्यक्षा जगदम्बा माँ की पूण्य तिथि के अवसर पर ब्रह्माकुमारी संस्थान सिविल लाइन थाना के पीछे, विक्टर एक्सरे गली, होटल सिटी सूर्या के सामने गया में पूरे दिन भर राजयोग अभ्यास किया गया है। इस अवसर पर शिशिर सौरव उपायुक्त, केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर, गया जोन ने कहा कि “दिव्य गुर्णों की खान जगदम्बा सर्व महान राजस्व अविनाशी रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ की प्राण, प्रथम प्रमुख संचालिका जगदम्बा सरस्वती ने अपना पुराना कलेवर बदलकर अव्यक्त भाव की सेवा में स्वयं को लगा दिया है। सृष्टि चक्र के आदि में उन्हीं के चिहनों का अनुसरण करते हुए आज का विश्वव्यापी ब्रह्माकुमारी संस्थान अपनी यश पताका लहराता जा रहा है। परमात्मा शिव द्वारा ज्ञान प्रकाश की प्रथम किरण निकलते ही वे जगत जननी रूप धारण कर अलौकिक माँ का प्यार- दुलार-सत्कार लुटाने लगीं थीं। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा शिव के ज्ञान गुणों को स्वयं में समाकर सारे जहाँ में फैलाने वाल महिला जगत् की सुर्य-चॉद-जगदम्बा हीं थीं। ज्ञानसूर्य सी प्रखर और चन्द्रमा सी शीतल -स्निग्ध होने के कारण ही ईश्वरीय परिवार की प्रगति का प्रवाह उनके इर्द-गिर्द ही बहता था।इस कार्यक्रम में उपस्थित वार्ड पार्षद सारिका कुमारी ने कहा मातेश्वरी जी जगतमाता के आसन पर विराजमान रह वेहद का प्यार लुटाते हुए टीचर ही नहीं मात् वत्सला स्वरूप सदा बनाये रखती थीं। वे दूरान्दशी-विशाल हृदया के साथ रूहानियत की प्रतिमूर्ति बन जल्दीबाजी में नहीं आदि-मध्य-अन्त को देखकर समस्या का समाचान कर देती थीं। किसी की भी बात को समाने के बजाय फैलाने का संस्कार ही नहीं था-यहाँ तक की कमियों-कमजोरियों वाली बात बाबा तक पहुँचाने में सकुचाती थीं ।इस कार्यक्रम में उपरिथत यशवंत सिंह ने कहा मातेश्वरी जी खुद ज्ञान योग से भरपूर थीं पर बाबा के श्री वचनों को सबेरे दो बजे उठकर विचार मंथन करके मक्खन निकाल सबेरे-सबेरे बच्चों में बॉटती हुई साक्षात ज्ञान की देवी सरस्वती दिखाई पड़ती शथीं है। समयबद्धता इतनी थी कि रोटी बनाने, अनाज साफ करते, सब्जी काटने वा भण्डारे में चक्कर लगाने जैसे किसी भी स्थूल वा सुक्ष्म सेवा के लिये ने इशारा दिया और उन्होंने हर कार्य को पूरी प्रवीनता से कर दिखाया है। सहनशीलता की ऐसी प्र्तिमूर्ति थीं कि निन्दा-स्तुति, मान-अपमान की हालात में ही नहीं, जटिल से जटिल बीमारियों को भी चेहरे पर दिखाई नहीं होने देतीं थीं।
दुःखदायी वा कठिनाई शब्द भी जुर्बों पर आने नहीं देती थी।
राजयोगिनी ब्रह्माकूमारी शीला बहन ने अपने संदेश में कहा उनकी वाणी जलतरंग की तरह अमृत बरसाती हुई सत्यता व निर्मलता से भरी होती थीं। नव सृष्टि के निर्माण हेत् संकल्प ब्रह्मा से निकलने पर उनका प्रचार-प्रसार करने में जगदम्बा इतनी कुशल थीं कि शिव बाबा ने उन्हें ज्ञान देवी सरस्वती, दुर्गुणों को मिटाने वाली दुर्गा, धन-सम्पदा से भरपूर करने वाली लक्ष्मी ही नहीं, विकराल विकारों को पी जाने वाली काली खपड़वाली जैसे अनेकों गुणों की प्रतिमूर्ति बना दिया है। उनके चमत्कारिक आध्यात्मिक व्यक्तित्व ने ही हिन्दु-मुस्लिम-सिख-ईसाई जैसे वर्ग संघर्ष में उलझे लोगों को इक्कीसवीं सदी के सत्पुरूषों योग्य बना दिया है।सदा आलौकिकता के सिंहासन पर बैठी रहने के कारण वे सदा ही किसी और लोक से आयी हुई परी जान पड़ती मम्मा ममता की मूरत थीं। गहन आध्यात्मिकता प्रणाओं से औत-प्रोत श्वेतवस्त्र धारिणी सरस्वती मैयया को ब्रह्मा की एक पसली से निर्मित हुआ माना जाता है। वैसे भी वे आदि देव की गोद ली हुई, दिल के पास रहने वाली अतिप्रिय संतान थीं। वे ऊँच-नीच के भेद-भाव रखे बिना, लौकिक मॉ-बाप से हजार गुणा निःस्वार्थ प्रेम व शुभेच्छा लुटाया करतीं थीं। वे माया के जंजीरों से ही मुक्त नहीं कराती पर ईश्वरीय जन्मसिद्ध अधिकार दिलाने हेतु प्रयत्नशील रहती थीं। वहत कोशिशों के बाद भी कोई आध्यात्मिक जागति पा जाये तो उन्हें आन्तरिक खशी होती थी। हीन भावनायें मिटाकर सम्पूर्ण आत्मविश्वास जगाने की उनमें अदभूत युक्ति व शक्ति थी।
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