जब अनुभव बना बदलाव की वजह, गांव में मजबूत हुई सुरक्षित मातृत्व की सोच

Live News 24x7
5 Min Read
  • बोचहां के बेला पांचगछिया में 65 महिलाओं ने साझा किए अनुभव
  • एएनसी और संस्थागत प्रसव को लेकर दिखी जागरूकता
मुजफ्फरपुर। करीब 15 वर्ष पहले जब राजकुमारी देवी के समय में गांव में प्रसव का मतलब घर पर दाई की मदद होता था, तब प्रसव के दौरान आने वाली जटिलताओं से निपटना आसान नहीं था। अब वही राजकुमारी अपनी बहू रीता देवी के गर्भावस्था के दौरान उसे पूरा आराम देती हैं और प्रसव के लिए अस्पताल को प्राथमिकता देती हैं। उनके लिए यह केवल एक परिवार का फैसला नहीं, बल्कि वर्षों में बदली सोच का उदाहरण है।
बोचहां प्रखंड के झपहां पंचायत स्थित टोला बेला पांचगछिया में आयोजित सामुदायिक बैठक में राजकुमारी देवी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पहले प्रसव के दौरान बच्चा फंसने या अधिक रक्तस्राव जैसी स्थिति में तत्काल मदद मिलना मुश्किल होता था। आज परिवार सुरक्षित प्रसव को प्राथमिकता दे रहा है और गर्भवती महिला को जरूरी आराम और सहयोग भी मिल रहा है।
यह बदलाव केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। रोगी हितधारक मंच (पीएसपी) मझौलिया, गूंजा जीविका ग्राम संगठन और ग्रामीणों की पहल पर आयोजित बैठक में 65 महिलाओं ने हिस्सा लिया। चर्चा का केंद्र था- गर्भावस्था की नियमित जांच, प्रसव की तैयारी और संस्थागत प्रसव। बातचीत के दौरान महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए और स्वास्थ्यकर्मियों से सवाल पूछकर अपनी समझ को और मजबूत किया।
चार एएनसी की जानकारी, खान-पान और टीकाकरण पर भी समझ:
बैठक में महिलाओं ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच को वे जरूरी मानती हैं। अधिकांश महिलाओं ने चारों एएनसी समय पर कराने की बात कही। संतुलित आहार, गर्भावस्था के दौरान टीकाकरण और आयरन की गोलियों के सेवन के महत्व से भी महिलाएं परिचित थीं। आशा और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के माध्यम से मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाओं के सेवन को लेकर भी महिलाओं में जागरूकता दिखाई दी।
प्रसव के बाद सरकारी संस्थान से मिलने वाली प्रोत्साहन राशि की जानकारी भी महिलाओं को थी। इससे पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी जानकारी अब केवल स्वास्थ्यकर्मियों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार और समुदाय के स्तर तक पहुंच रही है।
परिवार का सहयोग भी बना सुरक्षित मातृत्व की ताकत:
बैठक में हलीमा खातून ने बताया कि उनके परिवार में अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। इसके बावजूद परिवार की कोई महिला गर्भवती होती है तो सभी मिलकर उसकी देखभाल करते हैं और उसे काम पर जाने से रोकते हैं। उनका अनुभव बताता है कि सीमित संसाधनों के बीच भी परिवार का सहयोग गर्भवती महिला के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है।
रोगी हितधारक मंच बना संवाद का माध्यम:
सामुदायिक बैठक को एएनएम रिंकी कुमारी, एएनएम ममता कुमारी, चंद्रशेखर कुमार, जीविका सीएम सुनीता कुमारी, एमएनएस एमआरपी संजीव कुमार, अनिला कुमारी और आशा कार्यकर्ता पुतुल कुमारी ने संबोधित किया। पुतुल कुमारी रोगी हितधारक मंच की सदस्य भी हैं। स्वास्थ्यकर्मियों ने महिलाओं के सवालों और जिज्ञासाओं पर चर्चा करते हुए एएनसी और संस्थागत प्रसव से जुड़ी जानकारी साझा की।
बैठक की खास बात यह रही कि यह एकतरफा जागरूकता कार्यक्रम नहीं था। महिलाओं ने अपने अनुभव बताए, सवाल पूछे और स्वास्थ्यकर्मियों से सीधे संवाद किया। इसी संवाद ने सुरक्षित मातृत्व को लेकर उनकी समझ को और मजबूत किया।
बेला पांचगछिया की यह बैठक बताती है कि स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी जब समुदाय के बीच संवाद का हिस्सा बनती है, तो वह केवल सूचना नहीं रहती, बल्कि व्यवहार में बदलाव की आधारशिला बनती है। राजकुमारी देवी की कहानी से लेकर 65 महिलाओं की सामूहिक भागीदारी तक, गांव में सुरक्षित मातृत्व को लेकर बदलती सोच इसी सामुदायिक भागीदारी की तस्वीर पेश करती है।
22
Share This Article
Leave a review

Leave a review

Your email address will not be published. Required fields are marked *