भारतीय राजनीतिक गलियारों में अपनी पैनी रणनीतियों और बेबाक बयानों के लिए जाने जाने वाले राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने देश के सबसे बड़े और संवेदनशील अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों को लेकर एक बहुत ही बड़ा, तीखा और वैचारिक बयान दिया है। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने एक खुले मंच से और मीडिया साक्षात्कारों के दौरान देश के मुस्लिम समाज को नसीहत देते हुए यह दो टूक कहा है कि अब समय आ गया है कि मुसलमानों को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी, सुरक्षा और उचित प्रतिनिधित्व की चिंता खुद अपने दम पर करनी चाहिए, न कि किसी भी राजनीतिक दल के पिछलग्गू या एकतरफा वोट बैंक बनकर रहना चाहिए। दशकों से देश की चुनावी राजनीति में यह चर्चा का विषय रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में केवल एक निश्चित दल को हराने या जिताने के लिए वोटिंग करता आया है, लेकिन इसके बदले में उन्हें शासन और प्रशासन में वास्तविक भागीदारी नहीं मिलती है। प्रशांत किशोर के इस बयान ने मुख्यधारा की राजनीति और तथाकथित सेक्युलर दलों के भीतर एक भूचाल ला दिया है जो लंबे समय से मुसलमानों को केवल डर दिखाकर उनका वोट हासिल करते आए हैं लेकिन उनके उत्थान और सशक्तिकरण के लिए कभी कोई ठोस काम नहीं किया। उनके इस बयान के बाद से राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या वाकई अब मुस्लिम समाज पारंपरिक राजनीति से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर हालात जस के तस बने रहेंगे।
पारंपरिक राजनीतिक दलों द्वारा मुसलमानों के इस्तेमाल की सच्चाई
देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक के राजनीतिक इतिहास को अगर गहराई से खंगाला जाए तो यह बात साफ तौर पर सामने आती है कि लगभग हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल ने मुसलमानों को केवल और केवल एक ‘वोट बैंक’ के रूप में ही देखा है और उनका इस्तेमाल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए किया है। तथाकथित सेक्युलर दल चुनाव के समय डर और असुरक्षा की भावना का भय दिखाकर मुस्लिम मतदाताओं से एकतरफा वोट तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब सरकार बनती है तो मंत्रिमंडल, टिकट वितरण, नीति निर्धारण और विकास योजनाओं में उस अनुपात में हिस्सेदारी नहीं दी जाती जितनी उनकी आबादी का हक बनता है। प्रशांत किशोर ने इसी कड़वी सच्चाई पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि मुस्लिम समाज को अब यह समझना होगा कि कोई भी राजनीतिक पार्टी उनका भला करने के लिए राजनीति में नहीं बैठी है, बल्कि हर दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगा हुआ है। जब तक समुदाय के लोग खुद अपनी जमीन तैयार करके अपने हितों की रक्षा करने वाले नेतृत्व को आगे नहीं लाएंगे, तब तक उन्हें इसी प्रकार उपेक्षित किया जाता रहेगा और उनका भावनात्मक शोषण होता रहेगा। उनके इस तर्क ने उन तमाम राजनीतिक दलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है जो सालों से यह दावा करते आए हैं कि वे ही अल्पसंख्यकों के एकमात्र सच्चे हितैषी और रक्षक हैं।
राजनीतिक हिस्सेदारी और आत्मनिर्भरता की क्यों है सख्त जरूरत
किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि उसमें समाज के हर एक वर्ग, जाति और समुदाय को उसकी जनसंख्या और आवश्यकता के अनुसार शासन चलाने में उचित प्रतिनिधित्व मिले, ताकि उनकी आवाज सीधे नीति निर्माताओं तक पहुंच सके। प्रशांत किशोर का यह साफ मानना है कि जब तक मुसलमान खुद अपनी राजनीतिक ताकत को संगठित नहीं करेंगे और अपने दम पर दबाव बनाने की क्षमता विकसित नहीं करेंगे, तब तक उन्हें भीख में अधिकार मिलते रहेंगे जो कभी स्थायी नहीं हो सकते। आत्मनिर्भरता का यह सिद्धांत केवल आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति के क्षेत्र में भी उतना ही लागू होता है जहाँ जब तक आप अपने पैरों पर खड़े नहीं होंगे, तब तक दूसरे लोग आपके भाग्य का फैसला करते रहेंगे। मुस्लिम युवाओं और प्रबुद्ध वर्ग को अब पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों की पिछलग्गू संस्कृति से बाहर निकलकर अपने समाज के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और उद्यमिता के साथ-साथ मजबूत राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने पर जोर देना चाहिए। जब समाज का हर व्यक्ति अपने वोट की ताकत को समझेगा और बिना किसी डर या दबाव के अपने विवेक से सही और गलत का चुनाव करेगा, तभी जाकर वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना संभव हो सकेगी।
प्रशांत किशोर के इस बयान के देश की राजनीति पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव
प्रशांत किशोर द्वारा दिए गए इस बेबाक और क्रांतिकारी बयान के आने वाले समय में भारतीय राजनीति पर बहुत ही दूरगामी और गहरे प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है, क्योंकि यह सीधे तौर पर दशकों पुरानी स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता है। जो राजनीतिक दल यह मानकर बैठे थे कि मुस्लिम मतदाता हमेशा उनकी जेब में हैं और उन्हें बिना कुछ किए ही एकतरफा वोट मिल जाएंगे, अब उन्हें अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। एक तरफ जहां कुछ राजनीतिक दल इस बयान की आलोचना कर रहे हैं और इसे समाज को बांटने वाला बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुद्धिजीवियों और युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसे एक सच और व्यावहारिक सलाह के रूप में देख रहा है। राजनीति में जब तक वैचारिक मंथन और आत्मમंथन नहीं होता, तब तक बदलाव की बयार नहीं बह सकती और प्रशांत किशोर ने ठीक उसी जगह पर हाथ रखा है जिसे छूने से अधिकांश नेता कतराते हैं। आने वाले विधानसभा और अन्य चुनावों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या मुस्लिम समाज इस आह्वान से प्रेरित होकर अपनी पारंपरिक वोटिंग शैली में कोई बदलाव लाता है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस बयान ने देश की सियासत में एक नई बहस का दरवाजा जरूर खोल दिया है।
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