राज्य में जबरन, धोखेबाजी, प्रलोभन या शादी के झूठे वादे के जरिए होने वाले धर्मांतरण पर पूरी तरह अंकुश लगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। गृह विभाग द्वारा जारी आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, बहुचर्चित ‘महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026’ (Maharashtra Freedom of Religion Act, 2026) आगामी 28 अगस्त 2026 से पूरे राज्य में आधिकारिक रूप से लागू होने जा रहा है। इस कानून के लागू होने के साथ ही महाराष्ट्र देश के उन चुनिंदा 13 राज्यों की कतार में शामिल हो गया है, जहां अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए विशेष दंडात्मक विधान मौजूद हैं।
क्यों लाया गया यह कानून और क्या है सरकार का उद्देश्य?
राज्य सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से भोले-भाले नागरिकों, महिलाओं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को धोखे, प्रलोभन या सामाजिक प्रभाव का दुरुपयोग कर धर्म बदलने की शिकायतें सामने आ रही थीं।
विधानसभा में इस विधेयक को पेश करते समय सरकार ने स्पष्ट किया था कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इस अधिकार में किसी अन्य व्यक्ति का जबरन, छलपूर्वक या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार शामिल नहीं है। यह कानून किसी खास धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए तैयार किया गया है।
नए कानून में सजा और जुर्माने के कड़े प्रावधान
महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 के तहत सभी अपराधों को गैर-जमानती (Non-Bailable) और संज्ञेय (Cognizable) श्रेणी में रखा गया है। कानून में विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कठोर दंड का निर्धारण किया गया है:
- शादी के नाम पर अवैध धर्मांतरण: यदि कोई व्यक्ति विवाह करने या विवाह का झूठा वादा देकर धोखे से धर्म परिवर्तन कराता है, तो उसे न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक के कारावास और ₹1 लाख तक के जुर्माने की सजा होगी। ऐसी शादी को अदालत द्वारा अवैध (Null and Void) घोषित किया जा सकेगा।
- नाबालिग, महिला, SC/ST का धर्मांतरण: यदि पीड़ित व्यक्ति नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अस्वस्थ या अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग से है, तो दोषी को 7 साल तक की जेल और ₹5 लाख तक का जुर्माना भुगतना होगा।
- सामूहिक धर्मांतरण (Mass Conversion): एक साथ दो या दो से अधिक व्यक्तियों के अवैध धर्मांतरण के मामलों में दोषियों को 7 वर्ष तक की कैद और ₹5 लाख तक का आर्थिक दंड दिया जाएगा।
- बार-बार अपराध दोहराने वाले (Repeat Offenders): यदि कोई व्यक्ति पहले भी इस अपराध में संलिप्त पाया गया है और दोबारा दोषी सिद्ध होता है, तो उसे अधिकतम 10 वर्ष तक की जेल और भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
- संस्थाओं और ट्रस्टों पर कार्रवाई: यदि कोई एनजीओ, शैक्षणिक संस्थान या धार्मिक ट्रस्ट अवैध धर्मांतरण में लिप्त पाया जाता है, तो उसका सरकारी पंजीकरण और वित्तीय अनुदान तुरंत रद्द कर दिया जाएगा और उसके पदाधिकारियों को सजा होगी।
क्या है प्रलोभन (Allurement) का दायरा?
कानून में ‘प्रलोभन’ और ‘अनुचित प्रभाव’ की परिभाषा को काफी विस्तृत किया गया है। इसके अनुसार, किसी भी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के लिए निम्नलिखित में से किसी भी चीज का लालच देना अपराध माना जाएगा:
- नकद धन, उपहार या संपत्ति का हस्तांतरण।
- रोजगार, बेहतर लाइफस्टाइल या मुफ्त शिक्षा का वादा।
- शादी का लालच या झूठा सामाजिक वादा।
- दैवीय चमत्कार (Divine Healing) या किसी धर्म विशेष को श्रेष्ठ/हीन बताकर किया जाने वाला मनोवैज्ञानिक दबाव।
- शिक्षा के माध्यम से ब्रेनवॉशिंग या धार्मिक दुष्प्रचार करना।
स्वेच्छा से धर्म बदलने की क्या होगी कानूनी प्रक्रिया?
जो वयस्क नागरिक बिना किसी दबाव, प्रलोभन या छल के अपनी अंतरात्मा की आवाज पर स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उनके लिए भी कानून में सख्त प्रशासनिक प्रक्रिया तय की गई है:
- 60 दिन पहले नोटिस: धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पूर्व संबंधित जिले के जिलाधिकारी (District Magistrate) को लिखित सूचना और घोषणा पत्र देना होगा।
- धर्मांतरण कराने वाले की जिम्मेदारी: जो पुरोहित, पादरी या मौलवी धर्मांतरण की प्रक्रिया संपन्न कराएंगे, उन्हें भी कम से कम एक माह पहले प्रशासन को सूचित करना होगा।
- 21 दिन के भीतर सत्यापन: धर्म परिवर्तन संपन्न होने के 21 दिनों के भीतर जिलाधिकारी को अंतिम सत्यापन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
- सबूत का भार (Burden of Proof): इस कानून की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह साबित करने की पूरी जिम्मेदारी आरोपी या धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति पर होगी कि उसने यह कार्य पूरी तरह स्वेच्छा से और बिना किसी प्रलोभन के किया है।
कौन दर्ज करा सकता है एफआईआर?
पीड़ित व्यक्ति के अलावा, उसके माता-पिता, भाई-बहन या खून के रिश्ते, विवाह या गोद लेने के संबंध से जुड़े परिवार का कोई भी सदस्य पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दर्ज करा सकता है। पुलिस के लिए ऐसी किसी भी शिकायत पर तुरंत संज्ञान लेकर प्राथमिक जांच शुरू करना अनिवार्य बनाया गया है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और विरोध के स्वर
इस कानून को लेकर महाराष्ट्र के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ी हुई है। सत्तापक्ष का कहना है कि यह कानून जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ जैसी सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए जरूरी था। शिवसेना (यूबीटी) ने भी सदन में इस कानून के मूल सिद्धांतों का समर्थन करते हुए कहा था कि जबरन धर्मांतरण पर रोक लगनी ही चाहिए।
वहीं, दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सहित कई नागरिक संगठनों ने इस कानून का कड़ा विरोध किया है। आलोचकों का तर्क है कि 60 दिन पूर्व नोटिस देने की शर्त और अत्यधिक सख्त प्रावधान वयस्कों की निजता के अधिकार (Right to Privacy) और अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करते हैं।
28 अगस्त से पूरे महाराष्ट्र में लागू होने जा रहे इस कड़े कानून के बाद राज्य पुलिस और जिला प्रशासन ने जमीनी स्तर पर इसकी नियमावली को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की तैयारी पूरी कर ली है।
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