बिहार के शिक्षकों का दर्द, व्हाट्सएप ग्रुप से

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Live News 24×7 के लिए कैलाश गुप्ता।

#जब से मैंने शिक्षा मंत्री श्री मिथिलेश तिवारी जी का वह 500 मीटर वाला बयान सुना है, तब से मैं हँसे जा रहा हूँ। सोचता हूँ कि कैसे-कैसे लोग बैठे हैं यार सत्ता में! सोशल मीडिया पर आजकल जो मीम चलता है ना, *”कौन हैं ये लोग, कहाँ से आते हैं?”*, मुझे बिल्कुल उसी की याद आ रही है। सच कहूँ तो अब मुझे इन लोगों की बुद्धि पर तरस भी नहीं आता, बस अट्टहास करने का मन करता है।
आजकल दुनिया एआई (AI) से अंतरिक्ष के रहस्य सुलझा रही है, और हमारे शिक्षा विभाग ने एआई का क्या ‘क्रांतिकारी’ इस्तेमाल खोजा है? कि मास्टर साहब शौच के लिए स्कूल से कितनी दूर गए हैं! सरकार की सोच बस 500 मीटर के दायरे में सिमट गई है। शिक्षक की काबलियत अब उसके पढ़ाने से नहीं, बल्कि उसकी ‘शौच-लोकेशन’ से नापी जाएगी। परसाई जी बिल्कुल ठीक कहते थे कि, *”यह उस नंगे राजा की घोषणा है जिसे अपने बिना कपड़ों के होने पर गर्व है और वह चाहता है कि पूरी जनता उस पर तालियाँ बजाए।”*
अरे साहब, एआई से मॉनिटरिंग तो तब करिएगा जब आप खुद का सिस्टम सुधार लीजिएगा। एक साधारण सी प्राइवेट कंपनी भी हर महीने की पहली तारीख को अपने कर्मचारियों के खाते में सैलरी डाल देती है। लेकिन बिहार के शिक्षा विभाग के लिए ऐसा कर पाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। हकीकत यह है कि अभी भी स्थानीय निकाय के शिक्षकों की चार-चार महीने की सैलरी बाकी है। महीनों से वेतन का अता-पता नहीं है, शिक्षक का घर कैसे चल रहा है, इसकी किसी को परवाह नहीं है; लेकिन बातें सीधे सिलिकॉन वैली और एआई की हो रही हैं!
विभाग में जो भी नया अधिकारी या मंत्री आता है, वह बस शेखी बघारने में लगा रहता है। इनका बर्ताव ऐसा होता है जैसे सारे शिक्षक कोई जबरदस्ती घुसपैठ करके नौकरी में आ गए हों। हुजूर, ये सभी शिक्षक आपकी ही बनाई हुई व्यवस्था और कड़े नियमों के तहत चुनकर आए हैं और अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं। लेकिन इस सिस्टम का रवैया देखिए—जब मंत्री और प्रशासन के मन में आता है, तो अपनी वाहवाही लूटने के लिए इन्हीं शिक्षकों की पीठ थपथपाने लगते हैं, और जब मन भर जाता है, तो उन्हें सरेआम दुत्कारने और अपमानित करने लगते हैं।
दुनिया के बाकी देशों में देखिए। जर्मनी में जब अफसरों ने शिक्षकों के बराबर सैलरी मांगी, तो वहां की चांसलर ने साफ कह दिया, *”मैं आपको उन लोगों के बराबर सैलरी कैसे दे सकती हूँ, जिन्होंने आपको पढ़ा-लिखाकर इस लायक बनाया है?”* जापान में शिक्षक को राजा के सामने भी सिर झुकाने की जरूरत नहीं होती। और हमारे यहाँ? शिक्षक को बस एक कामचोर और दिहाड़ी मजदूर मान लिया गया है, जिस पर 24 घंटे जासूसी करना सरकार का पहला काम है। महान शिक्षाविद् प्रो. कृष्ण कुमार और प्रो. यशपाल जीवन भर यही समझाते रहे कि, *”शिक्षक कोई मशीन नहीं है, जब तक आप उसे सम्मान और आज़ादी नहीं देंगे, शिक्षा का ढांचा खड़ा नहीं हो सकता।”*
पिछले कुछ सालों के आदेश उठाकर देख लीजिए, शिक्षा विभाग एक कॉमेडी शो बन गया है। कभी लोटा लेकर खुले में शौच करने वालों को खदेड़ने की ड्यूटी, तो कभी खाली बोरे बेचने का फरमान। शराबियों की मुखबिरी से लेकर कबाड़ तौलने तक के आदेश आते रहे हैं। और अब ‘ई-शिक्षाकोष’ ऐप का नया ड्रामा! देहात में मोबाइल का नेटवर्क खोजने के लिए पेड़ पर चढ़ना पड़ता है। जिस ऐप पर कुछ हजार शिक्षक एक साथ हाजिरी बनाने लगें, तो वह ऐप ही बैठ जाता है। शिक्षक स्कूल में है, पर नेटवर्क गोल-गोल घूम रहा है और इसी चकरी में हाजिरी कट जा रही है।
ज्ञान चतुर्वेदी ने एकदम सटीक कहा है कि, *”यह उस झोलाछाप डॉक्टर की तरह है जो मरीज के ब्रेन ट्यूमर का इलाज, उसके पेट में कीड़े मारने की दवा देकर करना चाहता है।”* हमारी शिक्षा व्यवस्था की असली बीमारी कुछ और है, लेकिन मंत्री जी का सारा ज्ञान सिर्फ इस बात पर अटका है कि शिक्षक अपनी जगह से कितने कदम हिला।
अफसरों को लगता है कि ऐसे फरमानों से शिक्षकों का मनोबल गिरेगा या वे डरेंगे। लेकिन आज का शिक्षक इन आदेशों पर रोता नहीं, बल्कि स्टाफ रूम में बैठकर ठहाके लगाता है कि हमारे अधिकारी कितने मूर्ख हैं। जो सिस्टम चार महीने से अपने शिक्षकों को सैलरी नहीं दे पा रहा, वह ‘जियो-फेंसिंग’ और एआई की बात कर रहा है! शिक्षा को डंडे और जीपीएस के दम पर नहीं चलाया जा सकता। जब तक आप शिक्षक को उसका खोया हुआ सम्मान नहीं लौटाएंगे, तब तक आप चाहे जितने ऐप ले आएं, शिक्षा का स्तर ऐसे ही रसातल में जाएगा।

नोट-यह कोई समाचार नही है, यह दर्द भरी कहानी किसी एक शिक्षक के द्वारा शिक्षकों के व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर किया गया है जो बहुत मार्मिक है व हकीकत को दर्शाता है। इसे Live News 24×7 वेब चैनल का कोई लेना देना है।

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