“डीईओ बनाम शिक्षक, की जंग से क्या सुधर पाएगी शिक्षण व कार्यालयीय व्यवस्था, क्या होगा शिक्षक व अधिकारी के बीच उत्पन्न विवादों का अंत, पीड़ित शिक्षक को मिलेगा न्याय या मुकदमा हो जाएगा झूठा करार, क्या कहता है कानून

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Live News 24×7 के लिए कैलाश गुप्ता।

मोतिहारी। वैसे तो पूर्वी चम्पारण जिला का शिक्षा विभाग हमेशा सुर्खियों में रहता ही है। आज पुनः शिक्षक बनाम जिला शिक्षा पदाधिकारी के बीच विवाद उत्पन्न से पुनः एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। पहले भी कई अधिकारियों पर एसी-एसटी का मामला हो या छेड़खानी का दर्ज होते रहा है परन्तु किसी भी अधिकारी पर अबतक न तो कार्रवाई हुई है और ना ही किसी पर मामला लंबित रहा है, क्योंकि देर-सबेर मामले को झूठा करार दे दिया जाता है या समझौता हो ही जाता है।

इधर ताजा मामला जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार गिरी के विरुद्ध एसी-एसटी की विशेष अदालत में दर्ज हुआ है जो काफी चर्चा का विषय बन गया है।

क्या है मामला : जिले के छौड़ादानो प्रखंड के अमवा टोला नरकटिया के पंचायत शिक्षक प्रहलाद कुमार जो बिहार राज्य प्रारंभिक शिक्षक संघ के जिला प्रवक्ता हैं तथा यह अनुसूचित जाति से आते हैं। इन्होंने अदालत से न्याय की गुहार लगाई है, जिसमें इनके द्वारा जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार गिरी सहित अज्ञात तीन व्यक्तियों पर आरोप लगाया गया है। आरोप में कहा गया है कि पटना उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय के द्वारा कनीय शिक्षक द्वारा वरीय को प्रभार नही दिलवाया जा रहा है साथ ही बकाया वेतन का भी भुगतान नहीं किया जा रहा है।

इन्होंने कहा है कि मैं संघ के पदधारक होने के नाते शिक्षकों के लिखित आवेदन को प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष को दिया तथा शिक्षक की समस्या के निदान के लिए संघ के प्रवक्ता होने के नाते मैं स्वयं गत 12 मई को संजीव रंजन व ताराकांत बैठा शिक्षक के साथ जिला शिक्षा पदाधिकारी के कार्यालय में पहुंचकर जिला शिक्षा पदाधिकारी के समक्ष शिकायत रखी, जहाँ शिकायत सुनने के बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी द्वारा स्पष्ट शब्दों में संजीव कुमार रंजन और ताराकांत बैठा से रिश्वत का मांग किया गया जिसका हमने विरोध किया।

इसके बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार गिरी व अन्य तीन व्यक्तियों ने जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए धमकी दी और जूता मार कर बाहर निकालने को कहा। वही जिला शिक्षा पदाधिकारी ने सस्पेंड कर मजा चखाने की भी धमकी दी और केस में फंसा कर जीवन बर्बाद कर देने की बात कही।

मामले की परिवादी शिक्षक प्रह्लाद कुमार ने बताया है कि उक्त घटना को लेकर थाने में गए लेकिन वहाँ मुकदमा दर्ज नही किया गया जिसके कारण मेरे द्वारा 16 मई को जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार गिरी सहित तीन अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध अपने अधिवक्ता के माध्यम से एसी-एसटी अदालत में शिकायत दर्ज कराया गया है, जिसके आलोक में एससी-एसटी के विशेष अदालत में मामले की सुनवाई जारी है जिसमें पहली सुनवाई गत 17 मई को हुआ है तथा दूसरी सुनवाई अगले 17 जून को है।

वहीं इन्होंने बताया कि जिला शिक्षा पदाधिकारी व शिक्षक प्रहलाद कुमार बीच हुई घटित घटना के कुल छव गवाह है जिसमें संजीव रंजन, शशि रंजन कुमार, राजीव रंजन भास्कर, ताराकांत बैठा, उमेश कुमार तथा सुनील कुमार राय (सभी शिक्षक) का नाम शामिल है।

क्या कहते है जिला शिक्षा पदाधिकारी : जिला शिक्षा पदाधिकारी राजन कुमार गिरी से उनके कार्यालय प्रकोष्ठ में हुई वार्ता में इन्होंने मामले को झूठा करार देते हुए कहा है कि ऐसी कोई घटना घटित हुई ही नही है जिसे लेकर शिक्षक कोर्ट में गए है।
श्री गिरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला एक सोंची समझी साजिश के तहत कुछ लोग शिक्षक प्रह्लाद कुमार के माध्यम से अपना निशाना साध रहें है जिसमें कुछ शिक्षक व कार्यालय कर्मी शामिल है।

उन्होंने यह भी बताया कि जिला की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने और कार्यालयीय व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रयास चल रहा है जिसमें जहाँ कुछ शिक्षक प्रभावित हो रहे है वहीं कुछ कार्यलय कर्मी भी प्रभावित है जिसके कारण ये लोग अनावश्यक दबाव बनाने का असफल प्रयास कर रहे है, इसी का नतीजा है कि यह झूठा मुकदम दर्ज कराया गया है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा कि मेरे द्वारा किसी भी शिक्षक का जो भी जायज कार्य होता है व त्वरित किया जाता है और कराया जाता है तथा हम सीधे शिक्षकों से मिलते भी है।

उन्होंने यह भी कहा कि घटना 12 मई रोज मंगलवार को दिन के 1.30 बजे का बताया गया है जबकि उस दिन लगभग दिन-भर वी-सी चलता है तथा उस दिन परिवादी व नामित गवाह मुझसे मिले भी नही है तो किसी प्रकार की घटना-दुर्घटना की बात कहां से उत्पन्न हो गई। यह मामला पूरे तरह से झूठा व बेबुनियाद है।

वहीं उन्होंने यह भी कहा कि अप्रमाणित मामलों को लेकर कुछ शिक्षक अपना नेतागिरी चमकाने के फिराक में रहते है, यह सदियों से चलता भी आ रहा है। उन्होंने ने नाम नही लेते हुए कहा कि हाल के दिनों में शिक्षकों के हितैसी शिक्षक नेता के द्वारा अनावश्यक रूप से अप्रमाणित मामलों को लेकर आमरण अनशन भी किया गया जिसे पुनः उन्हें दूसरे दिन ही बिना शर्त तोड़ना पड़ा था।

उन्होंने जिला के तमाम शिक्षकों से स्पष्ट शब्दों में अपील करते हुए कहा है कि वे किसी के बहकावे में आकर अनावश्यक कदम नही उठावें जिससे शिक्षण व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो, साथ ही यह भी कहा कि किसी भी शिक्षक के जायज कार्य में कार्यालय के किसी कर्मी व अधिकारी के द्वारा बेवजह परेशान किया जाता है तो वे अपनी समस्या व शिकायत सीधे मुझतक पहुंचा सकते है जिसपर त्वरित कार्रवाई होगा।

बहराल देखना यह है कि क्या पूर्व की भांति यह भी मामला निचले स्तर पर ही सुलझ जाएगी या ऊपरी अदालत तक पहुंचेगी……

क्या कहता है एसी-एसटी कानून, क्या अग्रिम जमानत हो सकता है : कानून के जानकारों द्वारा बताया जाता है कि अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णय में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि यदि FIR में पहली नज़र में (Prima facie) कोई अपराध नहीं बनता है, तो न्यायालय गिरफ्तारी-पूर्व जमानत देने के लिए अपने विवेक का उपयोग कर सकता है।

क्या एसी-एसटी मुकदमे में पीड़िता को मुआवजा मिलता है : जी हां एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत अपराध की गंभीरता के आधार पर सरकार द्वारा पीड़िता को ₹85,000 से लेकर 8,25,000 रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है (कुछ विशेष गंभीर मामलों में यह राशि ₹10 लाख तक हो सकती है)।
गाली-गलौज या धमकी देने पर लगभग 85,000 रुपये का मुआवजा मिल सकता है। वहीं मारपीट या गंभीर चोट लगने पर 1,25,000 से 2,50,000 रुपये तक।

मुआवजे की किश्तें : यह राशि तीन किश्तों में दी जाती है।
पहली किश्त : एफआईआर (FIR) दर्ज होने के तुरंत बाद 25% से 50% राशि। दूसरी किश्त : पुलिस द्वारा चार्जशीट (Charge sheet) अदालत में पेश करने पर 50% राशि। तीसरी किश्त : अदालत में फैसला आने और आरोपी के दोषी साबित होने पर बाकी बची राशि दी जाती है।

झूठे शिकायतकर्ता पर केस : यदि जांच में केस झूठा साबित होता है, तो झूठी शिकायत करने वाले पर IPC की धारा 182/211 (या BNS की धारा 217/233) के तहत मानहानि और झूठा केस दर्ज कराने का मुकदमा किया जा सकता है, जिसमें 6 महीने से 5 साल तक की सजा का प्रावधान है

क्या है समझौते का प्रावधान : सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कई महत्वपूर्ण फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि यदि दोनों पक्षों के बीच स्वेच्छा से समझौता हो जाता है, तो आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Quash) किया जा सकता है।

समझौते का आधार : यदि न्यायालय को यह समाधान हो जाता है कि विवाद मुख्य रूप से व्यक्तिगत या दीवानी (Civil) प्रकृति का था, और घटना जातिगत दुर्भावना के कारण नहीं हुई थी, तो समझौता स्वीकार किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय में याचिका : एससी-एसटी एक्ट एक विशेष कानून है, इसलिए निचली अदालतें सीधे तौर पर मामले को खत्म नहीं कर सकतीं। समझौते के आधार पर एफआईआर (FIR) या केस को रद्द करवाने के लिए दोनों पक्षों को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528) के तहत एक याचिका दायर करनी होती है।

शर्तें और प्रक्रिया : माननीय न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि पीड़ित (विभागीय कर्मी) ने किसी दबाव या धमकी के बिना अपनी मर्जी से समझौता किया है।

सरकारी सहायता/मुआवजा : इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि एससी-एसटी एक्ट के मामले में समझौते के आधार पर केस को समाप्त किया जाता है, तो पीड़ित को राज्य सरकार से प्राप्त मुआवजा राशि सरकारी खजाने में वापस जमा करनी पड़ सकती है।

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