15 अप्रैल  1917 मे गाधी जी मोतिहारी आकर चलाया था सफल चंपारण सत्याग्रह

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  • मेरा वस चले तो मैं चंपारण में ही घर बनाकर बस जाऊं : महात्मा  गांधी
अशोक  वर्मा
मोतिहारी :  15 अप्रैल चंपारण के लिए काफी महत्वपूर्ण तिथि है, इस तिथि को महात्मा गांधी का चरण चंपारण की धरती पर पड़ा था और उनके  नेतृत्व में सफल चंपारण सत्याग्रह हुआ ।चंपारण सत्याग्रह का प्रभाव स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं पर पड़ा ,चंपारण से उन्हें शक्ति मिली और देश आजाद हुआ। 15 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी का आगमन मोतिहारी में हुआ था , उस जमाने के सरकारी वकील गोरख बाबू ने अंग्रेजो के इच्छा के विरुद्ध महात्मा गांधी को नगर के धर्म समाज रोड स्थित अपने मकान में ठहराया था। गांधीजी 16 अप्रैल को जसौली पट्टी के लिए निकल गए वे हाथी पर सवार होकर वहां जा रहे थे। वहां के संभ्रांत किसान बाबू लोमराज सिंह अंग्रेजों के क्रूर दमन के शिकार हुए थे ।जब गांधी जी को इसकी जानकारी मिली तो वे सीधे उनके आवास पर जाने के लिए निकल गए ।इस बीच अंग्रेजों के कान खड़े हो चुके थे। मुजफ्फरपुर में कमिश्नर ने उन्हें गलत जानकारी दी थी जिसमें चंपारण के किसानों पर अत्याचार आदि को उन्होंने इनकार किया था और उन्होंने गांधी जी को लौट जाने की सलाह दी थी। यहीं पर गांधी जी के मन में शंका उत्पन्न हुई थी और उन्होंने चंपारण आकर यहां वस्तु स्थिति की जानकारी लेना चाहते थे, और वही हुआ। जसौली पट्टी जाने के क्रम में चंद्रहीया में उन्हें प्रशासन द्वारा रोक दिया गया, उन्हें धारा 144 के तहत जिला भ्रमन पर रोक लगाने की नोटिस दी गई ।कानून को मानने वाले गांधी जी धर्म समाज रोड स्थित अपने ठहराव स्थल पर लौट आए। 16 अप्रैल की संध्या  दूसरी नोटिस मिली जिसमें  उन्हें 18 अप्रैल को कोर्ट में आकर अपनी बात रखने का आदेश था। गांधी जी ने तत्कालीन एसडीओ कोर्ट में जाकर 18 अप्रैल को चुनौती भरा बयान दिया। उन्होंने वह बयान खुद तैयार की थी । उन्होने कोर्ट मे कहा कि मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनकर इस जिले के किसानों के दुख दर्द को दूर करने के लिए आया हूं , मैं कानून को मानने वाला हूं और मेरे यहा रहने से किसी तरह की हिंसा फैलने की बात नही होगी।कानून के उल्लंघन का सवाल हीं नही है ।वैसे कानून अपना कार्य करने के लिए स्वतंत्र है ।बापू के इस खुले और चुनौतीपूर्ण बयान पर एसडीओ ने कहा कि आप चंपारण छोड़ दें तो आप पर से सभी मुकदमे उठा लिए जाएंगे। इस पर गांधी जी ने कहा कि” आप चंपारण छोड़ने की बात कर रहे हैं, अगर मेरा वस चले तो मैं यहीं पर घर बनाकर बस जाऊं” बापू ने जिस निर्भीकता एवं दृढ़ता के साथ अपना बयान दिया,वह संपूर्ण  देश के आंदोलनकारियो के लिये एक शक्ति बन गया। ।बापू के इस चुनौती भरे बयान के कारण ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि अगले डेट को गांधीजी को सजा हो  जायेगी और उन्हे जेल भेज दिया जाएगा।जजमेंट के दिन  22 तारीख को काफी संख्या में निर्णय सुनने के लिए चंपारण के किसान एसडीओ कोर्ट के आगे खड़े रहे। तत्कालीन जेल जो अभी एम एस कॉलेज  परिसर में था ,आज भी मूल स्वरूप में है,जेल अधीक्षक ने उसकी साफ सफाई करा दी थी थी ,गांधी जी के लिए कमरा भी तय कर दिया गया था लेकिन ब्रिटिश गवर्नमेंट ने गांधी जी के बयान को गंभीरता से लिया और उनके उपर से धारा 144 उठा लिया गया और गांधी  जी पर से धारा 144 उठा लिया गया।इस तरह से चंपारण सत्याग्रह की जीत हुई। देश-विदेश के अखबारों ने गुलाम भारत मे गाधी के नेतृत्व  वाले चंपारण सत्याग्रह की जीत की खबर को प्रमुख ता से छापा,विश्व के कई अखबारो ने अपने संपादकीय में भी लिखा ।                    दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी जी चंपारण की इस जीत से देश के लिए  बहुत बड़े संत महात्मा और नेता के रूप में उभर गए ।धारा 144 से मुक्त होने के बाद बापू ने संपूर्ण जिले का भ्रमण किया ,काफी लोग उनसे मिलने आने लगे और इस तरह भीड के कारण गोरख बाबू का वह मकान छोटा पड़ गया ।इस बीच नगर के स्टेशन रोड स्थित रामू बाबू केडिया का फुलवारी वाला मकान गांधी जी के लिए दिया गया ।कुछ दिनों तक बापू उसमें रहकर अपने सहयोगियों के साथ जिले के किसानों के बयान को दर्ज किया और यहां से वे बेतिया हजारीमल धर्मशाला मे ठहरकर  उस क्षेत्र के लोगों के बयान को  सूचीबद्ध किया । सभी बयानों का एक बंडल उन्होंने तत्कालीन जिला पदाधिकारी को देकर इस पर कार्रवाई करने का आग्रह किया ।जिला पदाधिकारी ने इसे गंभीरता से लिया और अनावश्यक जो भी कर लगाये गये थे  उसे उठा लिया ।किसानों को राहत मिली।इस प्रकार सफल चंपारण सत्याग्रह आजादी की लड़ाई के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया। बापू ने चंपारण भ्रमण के दौरान यहां की जो मूल समस्याओं को देखा उसके आधार पर उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता और चिकित्सा की समस्या को गंभीरता से लिया और दूसरे प्रदेश से  डॉक्टर लाल को बुलाकर चंपारण में मुफ्त चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराई। इतना ही नहीं स्वच्छता के लिए उन्होंने स्वयं खुरपी,झाडू आदि  लेकर निकल पड़ते थे और लोगों को साफ सफाई का संदेश देते थे। उन्होंने  शिक्षा नीति बनाई और पाठशालाएं खोली ।13 नवंबर 1917 को ढाका बडहरवा लखनसेन में उन्होंने प्रथम पाठशाला खोली ,20 नवंबर को भीतिहरवा में  दूसरी पाठशाला  तथा जनवरी 1918 में मधुबन में तीसरी पाठशाला खोली ।उन्होंने जो शिक्षा नीति बनाई उसमें पढ़ाई के साथ-साथ उपलब्ध स्थानीय संसाधन आधारित कुटीर उद्योगों का प्रशिक्षण को भी रखा । बापू सही मायने में ग्राम स्वराज स्थापित करना चाहते थे ।सभी का राज और सबका विकास तथा शोषण मुक्त समतामूलक व्यवस्था देना चाहते थे ।बापू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब मैं दक्षिण अफ्रीका से लौटा तो मै  हप्सी की तरह हो गया था लेकिन चंपारण ने मुझे नई पहचान दिलाई और चंपारण से मुझे पुरा विश्व जान गया।                                 चंपारण के स्वतंत्रता संग्राम इतिहास में पंडित राजकुमार शुक्ल का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। वे बापू  के पीछे  साया की तरह लगे रहे और बापू को भागीरथ की तरह चंपारण की धरती पर उतारा। बापू को चंपारण बुलाने मे परोक्ष  और अपरोक्ष रूप मे चंपारण के कई स्वतंत्रता सेनानियों का सहयोग रहा।कई सेनानी गुप्त भी रहकर  भारत माता को आजाद करने में तन मन धन से सहयोग करते रहे ,उसमें एक नाम आता है रामदयाल प्रसाद शाह का। वैसे तो उस समय वे बड़े जमींदार थे लेकिन अंग्रेजों के साथ बगावत किये  भारत माता के गुलामी के जंजीर को तोड़ने मे हमेशा आगे रहे,उनहोने पंडित राजकुमार शुक्ला को हमेशा आगे करके अपने राष्ट्र धर्म का पालन किया। राजकुमार शुक्ला जब भी मोतिहारी आते थे तो रामदयाल प्रसाद शाह के यहां ही ठहरते थे और रामदयाल बाबू बिल्कुल गुप्त तरीके से हर तरह का सहयोग देते थे। बाद में अंग्रेजों को जब पता लगा तो उन्होंने रामदयाल बाबू को प्रताड़ित और दमन भी किया उनकी जमींदारी पर भी प्रश्न खड़ा कर दिया ।बहुत तरह के उन पर अंकुश लगाए गए यहां तक कि गिरफ्तारी भी हुई जेल भी गए लेकिन भारत माता को आजाद करने में लगे रहे।चंपारण की जनता  उनके योगदान को भुला नहीं जा सकती।चंपारण में जो इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ उसके पीछे रामदयाल बाबू रीढ की हड्डी बने रहे। और आंदोलन को हमेशा गति देते रहे। चंपारण सत्याग्रह के दौरान बापू ने एक बात कही थी कि मैं चंपारण के गरीबों के आंखों में झांक कर राम का दर्शन किया हूं ।                            बापू का प्रेम चंपारण के लोगों के साथ अटूट था, ऐसा लगता था कि बापू पूर्व जन्म के संस्कार संबंध को जीवंत रूप दे रहे थे। चंपारण में भूकंप के बाद भी बापू आए और लोगों के दुख दर्द को देखा समझा। बापू ने बंजरिया पंडाल में 24 मई 1918 मे एक जमीन पर आश्रम का शिलान्यास भी किया था ।उक्त जमीन को उस समय मिसकौट के महान स्वतंत्रता सेनानी देवी लाल साह ने दान के रूप में बापू को दिया था ।आज उस जमीन पर कांग्रेस पार्टी का आश्रम और शहीद स्मारक है। इसके अलावा बापू द्वारा स्थापित  स्कूल बापू की शिक्षा नीति पर तो नहीं है लेकिन शिक्षण  कार्य चल रहा है। चंपारण के हर कण में बापू की याद समाई हुई है। यही कारण है कि मोतिहारी के गांधी भक्त तारकेश्वर प्रसाद के अलावा अन्य कई लोग गांधी जयंती का अवसर पर सर्वधर्म पूजनोत्सव का आयोजन करते हैं।मीना बाजार गांधी चौक पर दिव्यांग योगेंद्र कनौजिया पारंपरिक विधि विधान से गांधी जयंती पर उपवास करते हैं। 15 अप्रैल  और 2 अक्टूबर को मोतिहारी में  उत्सव का नजारा  रहता है ।जगह-जगह संगोष्ठी के करके लोग बापू को याद करते हैं। भले ही देश के रहनुमा बापू के सर्व धर्म समभाव या समता मूलक समाज निर्माण को पूर्ण रूप से लागू नहीं किये लेकिन चंपारण आज भी सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत पर  चल रहा हैं। यहां कभी भी किसी तरह का धार्मिक उन्माद नहीं हुआ। हर तरह से प्रेम भाव रहा है।चंपारण बापू की कर्म भूमि है और बापू की शक्ति आज भी यहां काम कर रही है।बापू के समृति स्थलो को देखने देश विदेश से लोग यहां आते हैं । जिस स्थान पर पहले एसडीओ कोर्ट था और बापू ने उसके डक में खड़े होकर अपना बयान दिया था, उस स्थान पर आज ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह महात्मा गांधी स्मारक स्तंभ खड़ा है तथा उसके परिसर में गांधी संग्रहालय वाचनालय एवं सभा भवन भी बन चुका है संग्रहालय परिसर में बापू के बयान को शीला पट्ट  पर अंकित किया गया है। बापू जिस टेबल पर बैठकर लिखते थे वह ऐतिहासिक टेबल संग्रहालय मे  रखा हुआ है। बापू की याद में बापू कस्तूरबा व्यवहृत सामान भी रखे हुए हैं। बडे ही श्रद्धापूर्वक लोग उसका अवलोकन करते है।
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