315 कॉल से शुरू पहल, अब एकीकृत व्यवस्था में हाई रिस्क गर्भवती की निगरान

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फोन फॉलोअप से जांच, इलाज, रेफरल और घर तक निगरानी जुड़ी
मुजफ्फरपुर।
“फोन पर स्वास्थ्यकर्मी से बात कर पता चला कि कौन-सी जांच जरूरी है और कब अस्पताल जाना है। इससे समय पर इलाज का भरोसा मिला।” एक लाभार्थी कंचन मांझी का यह अनुभव उस पहल को दर्शाता है, जिसकी शुरुआत हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को किए गए 315 फोन कॉल से हुई। अब इसे एचआरपी हेल्प डेस्क के रूप में व्यवस्थित किया जा रहा है।
पांच महीने में 3,541 हाई रिस्क गर्भवती चिह्नित:
अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच जिले में 32,249 गर्भवती महिलाओं ने प्रसवपूर्व जांच (एएनसी) कराई। इनमें 3,541 महिलाएं हाई रिस्क पाई गईं। अब उनका नियमित फॉलोअप और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता है।
315 कॉल के अनुभव से बनी नई व्यवस्था:
पिरामल के नसीरुल होदा ने कहा, “315 कॉल के फॉलोअप से स्पष्ट हुआ कि फोन संपर्क जरूरी है, लेकिन इसके बाद की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए। हाई रिस्क गर्भवती की पहचान के बाद अगली कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने वाली व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई।”
यह पहल अब केवल फोन संपर्क तक सीमित नहीं है। 315 कॉल का अनुभव ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव बन रहा है, जिसमें हाई रिस्क गर्भवती की पहचान के बाद जांच, इलाज, रेफरल और घर तक फॉलोअप लगातार जुड़े रहें।
‘पहचान के बाद अगला कदम अहम’
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रेरणा सिंह ने कहा, “हाई रिस्क गर्भावस्था में जोखिम की पहचान पहला कदम है। इसके बाद समय पर जांच, उपचार, परामर्श और जरूरत पड़ने पर रेफरल अधिक महत्वपूर्ण है। हेल्प डेस्क इन सभी कड़ियों को व्यवस्थित कर रहा है।”
सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने कहा, “हाई रिस्क मामलों में समय पर निर्णय और रेफरल जरूरी है। इसके लिए स्वास्थ्य संस्थान से सामुदायिक स्तर तक जिम्मेदारियां तय की गई हैं, ताकि सुरक्षित संस्थागत प्रसव की कोई कड़ी कमजोर न पड़े।”
शुरुआत में फोन के जरिए  महिलाओं की स्थिति और फॉलोअप की जानकारी ली गई। इससे स्पष्ट हुआ कि केवल फोन पर सलाह पर्याप्त नहीं है। जोखिम की पहचान के बाद जांच, उपचार, रेफरल और घर तक फॉलोअप को जोड़ना जरूरी है। इसी आधार पर हेल्प डेस्क विकसित किया गया।
जोखिम की पहचान के बाद तय होता है अगला कदम:
हेल्प डेस्क पर जांच के बाद हाई रिस्क गर्भवती की पहचान की जाती है। चिकित्सक और नर्स सामान्य व पेट की जांच, भ्रूण की धड़कन, हीमोग्लोबिन, शुगर, पेशाब, ब्लड ग्रुप, एचआईवी और वीडीआरएल रिपोर्ट देखते हैं। जरूरत के अनुसार आगे की जांच और उपचार शुरू किया जाता है। हाई रिस्क मामलों को लाल स्टिकर से चिह्नित किया जाता है, ताकि आगे भी उनकी पहचान बनी रहे।
हाई रिस्क की पहचान के बाद जांच, उपचार, रेफरल और फॉलोअप की जिम्मेदारी भी तय की जाती है।
अस्पताल से गांव तक जिम्मेदारियां तय:
इस व्यवस्था में चिकित्सा पदाधिकारी, अस्पताल प्रबंधन, बीएचएम-बीसीएम, परामर्शदाता, सीएचओ, एएनएम और आशा को उनकी भूमिका के अनुसार जोड़ा गया है। पीएमएसएमए के तहत हर महीने 9, 15 और 21 तारीख को होने वाली गतिविधियों में हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं की सूची तैयार करने, पोर्टल पर जानकारी दर्ज करने और फॉलोअप की निगरानी पर जोर दिया गया है।
क्षेत्र स्तर पर सीएचओ और एएनएम महिलाओं से संपर्क बनाए रखते हैं। आशा घर जाकर फॉलोअप करती हैं और जरूरत पड़ने पर महिला को स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचाने में सहयोग करती हैं। इससे अस्पताल से शुरू देखभाल गांव तक जारी रहती है।
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