भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) आज देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है और छोटे से लेकर बड़े लेन-देन के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। साल 2016 में अपनी शुरुआत के बाद से लेकर अब तक, यूपीआई ने वित्तीय लेन-देन की दुनिया में एक अचंभित करने वाला इतिहास रच दिया है। पिछले 10 वर्षों के सफर में यूपीआई के ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में लगभग 13,000 गुना की ऐतिहासिक और रिकॉर्डतोड़ छलांग देखने को मिली है। आज भारत का यह स्वदेशी डिजिटल पेमेंट मॉडल दुनिया भर के लिए एक नजीर बन चुका है, जिसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सुनाई दे रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अभूतपूर्व सफलता की सराहना की है।
ऐसे हुई थी यूपीआई की शुरुआत और पहला ट्रांजैक्शन
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की निगरानी में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने साल 2016 में यूपीआई को लॉन्च किया था। शुरुआत में इसे बेहद सीमित बैंकों और सुविधाओं के साथ उतारा गया था, लेकिन इसके विजन ने देश की तकदीर बदल दी। बात करें यूपीआई के पहले ट्रांजैक्शन की, तो इस क्रांतिकारी व्यवस्था को विधिवत रूप से अप्रैल 2016 में तत्कालीन नीति निर्माताओं और बैंकिंग दिग्गजों की मौजूदगी में पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू किया गया था, जिसमें चुनिंदा 21 बैंकों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद अगस्त 2016 में इसे आम जनता के लिए पूरी तरह खोल दिया गया, और तब से लेकर आज तक इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े मॉल तक, हर जगह यूपीआई ने अपनी गहरी पैठ बना ली है।
10 साल में 13,000 गुना बढ़ी रफ्तार और आंकड़े
यूपीआई के सफर में पिछले एक दशक के भीतर वित्तीय आंकड़ों ने जो छलांग लगाई है, वह वाकई हैरान करने वाली है। वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान जहां सालाना ट्रांजैक्शन की संख्या महज 1.78 करोड़ थी, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार यह संख्या बढ़कर 24,162 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई। अगर कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू की बात करें, तो यह शुरुआती 0.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। मौजूदा समय में हर दिन करोड़ों की संख्या में लोग बिना किसी रोक-टोक के अपने स्मार्टफोन के जरिए एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में पलक झपकते ही पैसे ट्रांसफर कर रहे हैं।
छोटे भुगतानों और तकनीक का बढ़ता दायरा
आज यूपीआई की सफलता के पीछे 500 रुपये से भी कम के छोटे यानी पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन की बहुत बड़ी भूमिका है। कुल वॉल्यूम का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा छोटे भुगतानों से आता है, जो यह साबित करता है कि चाय की टपरी से लेकर सब्जी की रेहड़ी तक हर जगह डिजिटल भुगतान आम हो चुका है। इसके अलावा, समय के साथ इसमें कई आधुनिक फीचर्स जोड़े गए जैसे कि यूपीआई लाइट, ऑटोपे, फीचर फोन के लिए यूपीआई 123पे और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, जिससे देश के दूर-दराज के इलाकों में बैठे लोग भी सुरक्षित तरीके से इसका लाभ उठा पा रहे हैं।
ग्लोबल मंच पर भारत के डिजिटल पेमेंट की धमक
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और दुनिया भर की वित्तीय संस्थाएं भी यूपीआई को दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम मान चुकी हैं। अकेले साल 2025 में दुनिया भर के कुल रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन का लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत के यूपीआई प्लेटफॉर्म ने प्रोसेस किया है। भारत की सीमाओं से निकलकर अब यूपीआई ग्लोबल हो चुका है। फ्रांस, यूएई, सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, कतर, कंबोडिया के बाद अब ग्रीस और मालदीव जैसे देशों में भी यूपीआई का डंका बज रहा है और कुल 11 देशों में यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑपरेशनल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर गर्व जताया है कि कैसे भारत की तकनीक आज ग्लोबल साउथ और पूरी दुनिया के लिए एक शक्तिशाली डिजिटल टूल बन चुकी है।
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