सोमेश्वर नाथ धाम अरेराज में आयोजित ब्रह्माकुमारियों के तीन दिवसीय नवरात्र मेला के अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय दुर्गा चैतन्य देवी की झांकी मे महिषासुर वध नाटक का तीनों दिन प्रदर्शन हुआ. वैसे तो कार्यक्रम में कई गीत डांडिया नृत्य के साथ झिझीया नृत्य भी हुआ लेकिन महिषासुर वध नाटक ने अपना विशेष प्रभाव छोड़ गया. काफी संख्या में नाटक को देखने भीड़ उमड़ती रही. नाटक के पात्र में महिषासुर के रूप में शिव प्रसाद गिरी ने अद्भूत अभिनय कला का प्रदर्शन किया, 6 फीट लंबे महिषासुर कद काठी में बिलकुल राक्षसी स्वरूप मे थे. उनके चेहरे का भाव भंगिमा बिल्कुल क्रूर, विकारी एवं गुस्सैल था. देवी मां दुर्गा के साथ हिंसक एवं आक्रामक संवाद था. 4फीट कद की गोल मटोल दुर्गा के रोल की परिधि की दिव्यता बिखरते चेहरा महिषासुर पर नजर पड़ते ही ज्वालामुखी स्वरूप में बदलना परिपक्व एवं मजे हुए कलाकार के भाव को दर्शाया. नाटक के संवाद कसे हुये थे . महिषासुर एवं दुर्गा के बीच शस्त्रों के साथ का युद्ध काफी रोचक था. महिषासुर के गर्जना युक्त संवाद के बीच दुर्गा मां की मधुर मीठी लेकिन तेजोमय आवाज अति प्रभावशाली थी. भयानक म्यूजिक के बीच दर्शक खामोशी मे सांस रोक हर दृश्य का आनंद लिया. सोशल मीडिया के दौर में तीन दिनों के सांस्कृतिक आयोजन में सभी के मोबाइल बंद मिले. नाटक को देख दर्शक़ो ने एक नई अनुभूति की . युद्ध के आरंभ में तो पहले दुर्गा की सवारी शेर ने महिषासुर पर जोरदार आक्रमण किया लेकिन शेर को कमजोर पड़ते देख दुर्गा माता स्वयं युद्ध में कूद पड़ी और महिषासुर को चुनौती दी कि अब तुम बच नहीं पाओगे. महिषासुर ने अपनी वरदान का हवाला दिया और दुर्गा को युद्ध से भागने की सलाह दी.दुर्गा अडिग रही और लगातार महिषासुर पर आक्रमण करती रही. अंत में महिषासुर का पराजय हुआ और त्रिशूल के वार को वह सह नहीं सका,गिर गया और याचक बन दुर्गा मां से माफी मांगी. उसको अपने वरदानी देह अभियान का एहसास हुआ और अपनी भूल के लिए माता से बार-बार माफ़ी मांगी. नाटक समाप्ति पर तालियों की गूंज से दर्शकों ने कलाकारों का अभिनंदन और स्वागत किया. नाटक के मुख्य निर्देश ब्रह्मा कुमारी लक्ष्मी का सधा हुआ कठिन परिश्रम रंग लाया और कलाकारों ने अपने जीवंत अभिनय से भारत के प्राचीन नाटक परंपरा को सफल किया. नाटक ने असत्य पर सत्य की जीत को बड़े ही सहज अंदाज से प्रस्तुत किया. जिस तरह दुर्गा की चैतन्य झांकी सजी थी ठीक उसी तरह कलाकारों ने अपने चैतन्य स्वरूप एवं दमदार अभिनय तथा डायलॉग से पुरानी पर्दा खींचने की मचीये व्यवस्था से एक बार दर्शकों को साक्षात्कार कराया. दर्शकों ने पुरानी परंपरा के नाटक रामलीला,सत्य हरिश्चंद्र महिषासुर वध नाटक परंपरा के इस नाटक को देख गदगद हुए.वर्तमान आधुनिक कैसेट डांस,नृत्य पाश्चात्य ड्रेस वेशभूषा की उबाऊ परंपरा को महिषासुर वध नाटक ने बौना साबित कर दिया, साथ साथ इस बात को भी प्रमाणित किया कि आम दर्शक एवं श्रोताओं के अंदर बैठी हुई धार्मिक कथा कहानी आधारित नाटक संगीत एवं अनुपस्थिति प्रस्तुति देखने की ललक आज भी गहराई तक बैठी हुई है. मूल संस्कृति एवं परंपरा जिसकी जरा भी संवाद एवं अभिनय अगर स्पर्श हो तो न सिर्फ पुराने जनरेशन के लोग बल्कि नए आधुनिक दौर के युवक एवं युवतिया भी उसे भरपूर स्वीकार करती है. महिषासुर वध नाटक में तीन दिनों तक लोगों को मोबाइल से दूर कर दिया था. वे सामने प्रत्यक्ष जीवंत अभिनय को देखा आत्म विभोर हुए. नाटक के सहयोगी निर्देशक ब्रह्माकुमारी विभा एवं करुणा थी. प्रस्तुत सारे सांस्कृतिक आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सारे कलाकार एवं चैतन्य देवी के रूप दुर्गा,लक्ष्मी,सरस्वती, कार्तिक के रूप में सजे हुए सभी कलाकार ब्रह्माकुमारी संस्था के नियमित योग अभ्यासी थे. यही कारण है कि उनके अभिनय में जीवंतता थी जिससे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हुआ साथ-साथ वे तृप्त भी हुए..
55