- रांची और रामगढ़ में एक ही सप्लायर के रेट में 40% तक का फर्क क्यों? दवा खरीद के नाम पर करोड़ों के बंदरबांट का शक
- डीसी ऋतुराज की जांच से खुलेगा दवा खरीद का पूरा राज
- आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है दवाई घोटाले का करोड़ों का खेल
रामगढ़: जिले में सरकारी दवा खरीद को लेकर सामने आए रेट अंतर ने स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिस दवा की कीमत महज 18 बताई जा रही है, रामगढ़ में उसी दवा की खरीद 725 में की गई। यदि दस्तावेजों में यह अंतर सही साबित होता है, तो यह केवल कीमत का मामला नहीं, बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की गंभीर जांच का विषय बन सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक ही आपूर्तिकर्ता द्वारा रांची और रामगढ़ में दवा सप्लाई किए जाने के बावजूद कीमतों में 40 प्रतिशत तक का अंतर कैसे आ रहा है? क्या दोनों जिलों में खरीद की शर्तें अलग थीं, या फिर दवा खरीद के नाम पर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने का कोई खेल चल रहा है?
जांच के केंद्र में तीन बड़े सवाल
01)18 बनाम 725
क्या एक ही दवा के खरीद रेट में इतना बड़ा अंतर वास्तविक है?
02)रांची बनाम रामगढ़
एक ही आपूर्तिकर्ता के बिलों में 40% तक अंतर का आधार क्या है?
03)जिम्मेदार कौन?
क्या खरीद स्वीकृति, दर निर्धारण और भुगतान की प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता हुई?
सिविल सर्जन की भूमिका पर उठे सवाल, क्या बिना संरक्षण के संभव है इतना बड़ा खेल?
दवा खरीद की पूरी प्रक्रिया में सिविल सर्जन कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। टेंडर जारी करने से लेकर दर स्वीकृति, आपूर्ति, बिल सत्यापन और भुगतान तक कई स्तरों पर जिम्मेदारी तय होती है। ऐसे में यदि कथित तौर पर एक ही दवा के रेट में भारी अंतर है, तो स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
सवाल यह है कि
क्या सिविल सर्जन कार्यालय ने दवाओं की बाजार कीमत और दूसरे जिलों में लागू दरों का तुलनात्मक अध्ययन किया?
क्या टेंडर में शामिल आपूर्तिकर्ताओं की दरों का सही तरीके से मूल्यांकन किया गया?
क्या आपूर्ति से पहले दवा की गुणवत्ता, मात्रा और स्वीकृत रेट का सत्यापन हुआ?
क्या किसी एक आपूर्तिकर्ता को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया में ढिलाई बरती गई?
यदि सरकारी धन का नुकसान हुआ, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या कथित रेट के इस खेल में रामगढ़ के सिविल सर्जन कार्यालय का संरक्षण मिला हुआ है? यह गंभीर आरोप है, जिसका जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है। बिना दस्तावेजी जांच के किसी अधिकारी या आपूर्तिकर्ता को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि खरीद प्रक्रिया में अनियमितता के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित आपूर्तिकर्ताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए।
एक ही सप्लायर, दो जिले और रेट में 40% तक का अंतर!
दवा खरीद में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु रांची और रामगढ़ की तुलना है। आरोप है कि एक ही आपूर्तिकर्ता ने दोनों जिलों में दवाओं की सप्लाई की, लेकिन कीमतों में 40 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
यहां जांच का असली सवाल यह है कि क्या दोनों जगह—
* दवा का नाम और ब्रांड एक ही था?
* दवा की मात्रा और पैकिंग समान थी?
* खरीद की तारीख और टेंडर की शर्तें एक जैसी थीं?
* टैक्स, परिवहन और अन्य शुल्क में कोई वास्तविक अंतर था?
* सप्लाई का रेट सरकारी स्वीकृत दर के अनुसार था या मनमाने तरीके से तय किया गया?
यदि इन सभी बिंदुओं में समानता है और फिर भी रामगढ़ में दवा महंगी खरीदी गई, तो सरकारी खजाने पर पड़े अतिरिक्त बोझ की गणना होनी चाहिए। इसी से यह पता चलेगा कि मामला महज खरीद दर का अंतर है या वास्तव में वित्तीय अनियमितता का।
18 की दवा 725 में: अंतर की गणना भी जरूरी, करोड़ों रुपये के गबन का शक, आखिर किसके खाते में गया सरकारी पैसा?
सरकारी दवा खरीद में यदि किसी दवा को वास्तविक बाजार दर से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदा गया हो, तो इससे सरकारी खजाने को नुकसान हो सकता है। लेकिन करोड़ों रुपये के गबन की पुष्टि के लिए कुल खरीदी गई दवाओं की संख्या, प्रति यूनिट अंतर और किए गए भुगतान का मिलान करना होगा।
जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि:
पिछले वर्षों में रामगढ़ जिले में कितनी दवाओं की खरीद हुई?
प्रत्येक दवा का टेंडर रेट क्या था?
किस आपूर्तिकर्ता को कितने रुपये का भुगतान किया गया?
रांची और रामगढ़ में समान दवाओं के रेट में कितना अंतर था?
क्या एक ही कंपनी को बार-बार ठेका दिया गया?
क्या आपूर्ति के बाद बिलों में संशोधन या अतिरिक्त भुगतान हुआ?
क्या दवाओं की वास्तविक आपूर्ति और भुगतान की गई मात्रा में अंतर है?
यदि जांच में सरकारी धन की हेराफेरी साबित होती है, तो दोषियों से राशि की वसूली, विभागीय कार्रवाई और आवश्यकतानुसार प्राथमिकी दर्ज करने की कार्रवाई होनी चाहिए।
डीसी ऋतुराज से उम्मीद, निष्पक्ष जांच से खुलेगा पूरा राज
रामगढ़ के उपायुक्त ऋतुराज से इस मामले में निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की उम्मीद की जा रही है। दवा खरीद में कथित अनियमितता का मामला सीधे जनता के स्वास्थ्य और सरकारी धन से जुड़ा है। इसलिए इसकी जांच केवल विभागीय स्तर पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच टीम के माध्यम से कराई जानी चाहिए।
डीसी से प्रमुख मांगें
दवा टेंडर की पूरी फाइल और सभी आपूर्तिकर्ताओं की दरों की जांच।
रांची और रामगढ़ में एक ही दवा की खरीद दरों का तुलनात्मक ऑडिट।
18 और 725 वाले दावे की मूल बिल और टेंडर से पुष्टि।
सिविल सर्जन कार्यालय की खरीद समिति और भुगतान प्रक्रिया की जांच।
संबंधित आपूर्तिकर्ता के सभी बिल, सप्लाई चालान और भुगतान का मिलान।
यदि सरकारी नुकसान साबित हो, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई और राशि की वसूली।
जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर सिविल सर्जन कार्यालय की दवा एवं अन्य सामग्री से संबंधित निविदा सूचना उपलब्ध है। दवा खरीद से जुड़े मूल दस्तावेजों की जांच के लिए यही आधिकारिक टेंडर रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी? जवाब जरूरी है
इस पूरे मामले में रामगढ़ के सिविल सर्जन का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि 18 की दवा 725 में खरीदने का दावा सही है या नहीं। यदि कीमत सही है, तो उसके पीछे क्या कारण था? क्या यह अलग ब्रांड, अलग पैकिंग, अलग खरीद प्रक्रिया या अन्य स्वीकृत शुल्क के कारण हुआ?
इसी तरह आपूर्तिकर्ता से भी पूछा जाना चाहिए कि रांची और रामगढ़ में एक ही दवा के रेट में इतना अंतर क्यों आया। यदि उनके पास वैध दस्तावेज और स्वीकृत दर का आधार है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: दवा खरीद में पारदर्शिता जरूरी, दोषियों पर हो कार्रवाई
दवा खरीद का पैसा जनता के टैक्स से आता है। अस्पतालों में मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जारी धन में किसी भी प्रकार की अनियमितता गंभीर मामला है। यदि 18 की दवा 725 में खरीदे जाने का आरोप दस्तावेजों से साबित होता है, तो यह सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की ओर इशारा करेगा।
अब सवाल सिर्फ रेट का नहीं, बल्कि पूरी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता का है।
क्या रामगढ़ में दवा खरीद के नाम पर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया? क्या एक ही आपूर्तिकर्ता को फायदा पहुंचाया गया? क्या सिविल सर्जन कार्यालय की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी? और यदि करोड़ों रुपये का गबन सामने आता है, तो दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?
इन सवालों का जवाब अब जिला प्रशासन की जांच से ही सामने आएगा।
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