महंगाई का बड़ा झटका: 1 महीने में 21% महंगी हुई चीनी, वजह एथेनॉल नहीं; जानिए आपकी जेब पर कितना पड़ेगा असर

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देश भर में आम आदमी की रसोई के बजट पर एक बार फिर महंगाई की मार पड़ती दिख रही है। दैनिक उपयोग की सबसे अहम वस्तु यानी चीनी की कीमतों में पिछले एक महीने के भीतर अप्रत्याशित उछाल दर्ज किया गया है। थोक और खुदरा मंडियों में चीनी की कीमतें लगभग इक्कीस प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। आम तौर पर जब भी चीनी के दाम बढ़ते हैं तो सबसे पहला संदेह गन्ने के रस से एथेनॉल बनाने के सरकारी प्रोत्साहन पर जाता है। हालांकि बाजार विशेषज्ञों और उद्योग के जानकारों का कहना है कि इस बार कीमतों में आए इस तेज उछाल के पीछे एथेनॉल नीति नहीं बल्कि कई अन्य घरेलू और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं।

मंडियों में अचानक क्यों बिगड़ा चीनी की मांग और आपूर्ति का संतुलन

चीनी उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार इस समय बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। प्रमुख उत्पादक राज्यों जैसे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की प्रमुख मंडियों में चीनी के भाव में लगातार मजबूती देखी जा रही है। मौसम की अनिश्चितता और पिछले सत्र के दौरान कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बारिश के असमान वितरण के कारण कुल उत्पादन अनुमानों पर असर पड़ा है। मिलों की तरफ से बाजार में आने वाली मासिक चीनी के कोटे का प्रबंधन और खुले बाजार में उपलब्धता के बीच तालमेल की कमी ने कीमतों को हवा दी है। जब आपूर्ति पक्ष में थोड़ी सी भी कमी की आशंका दिखती है तो थोक कारोबारी और स्टॉकिस्ट अग्रिम खरीदारी शुरू कर देते हैं, जिससे कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

एथेनॉल नीति नहीं, ये जमीनी कारक बने महंगाई की मुख्य वजह

अक्सर यह माना जाता है कि चीनी मिलें अधिक लाभ कमाने के लिए गन्ने के शीरे या सीधे गन्ने के रस को एथेनॉल उत्पादन में डायवर्ट कर देती हैं, जिससे खाने वाली चीनी की कमी हो जाती है। केंद्र सरकार ने इस संतुलन को बनाए रखने के लिए पहले ही सख्त दिशा-निर्देश और सीमाएं तय कर रखी हैं। इस बार कीमतों में तेजी का मुख्य कारण बढ़ती इनपुट लागत, मिलों पर बढ़ता ट्रांसपोर्टेशन खर्च और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चीनी के रुख में आई तेजी है। वैश्विक स्तर पर ब्राजील और थाईलैंड जैसे बड़े निर्यातक देशों में उत्पादन से जुड़ी चिंताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। इसका सीधा मनोवैज्ञानिक असर घरेलू व्यापारियों और मिल मालिकों की मूल्य निर्धारण रणनीति पर पड़ रहा है।

लोकल मंडियों और खुदरा दुकानों पर सीधा असर

उत्तर भारत की प्रमुख मंडियों से लेकर दक्षिण और पश्चिम भारत के खुदरा बाजारों तक चीनी के दाम पचास रुपये प्रति किलोग्राम के पार पहुंचने लगे हैं। थोक बाजार में प्रति क्विंटल भाव बढ़ने के कारण स्थानीय स्तर पर किराना दुकानदारों ने भी अपने मार्जिन को सुरक्षित रखते हुए कीमतें बढ़ा दी हैं। पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री, बेकरी, मिष्ठान निर्माता और सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियों की लागत बढ़ने लगी है। इसका सीधा असर यह होगा कि आने वाले दिनों में बिस्कुट, मिठाइयां, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी इजाफा देखने को मिल सकता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहां प्रति व्यक्ति खपत अधिक है, वहां इस बढ़ोतरी का असर पारिवारिक बजट पर तुरंत महसूस किया जा रहा है।

आगामी त्योहारी सीजन और उपभोक्ताओं की बढ़ती चिंताएं

भारतीय बाजारों में त्योहारों और वैवाहिक आयोजनों के दौरान चीनी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में तीस से चालीस प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यदि समय रहते कीमतों पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो आगामी महीनों में जब मांग चरम पर होगी, तब उपभोक्ताओं को और अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। मिठाई कारोबारियों का कहना है कि लागत में वृद्धि के कारण उनके लिए पुरानी दरों पर उत्पाद बेचना संभव नहीं होगा। सरकार की तरफ से ओपन मार्केट सेल स्कीम या अतिरिक्त रिलीज कोटा जारी कर स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर स्टॉक की सुगम आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होती, तब तक कीमतों में स्थिरता आना चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है।

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