पत्नी अपनी मर्जी से प्रेमी को नहीं बना सकती बच्चे का पिता, केरल हाईकोर्ट का पुरुषों के हक में बड़ा फैसला

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 समाज में बढ़ते वैवाहिक विवादों और बच्चों के पितृत्व (Paternity) से जुड़े मामलों के बीच न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने यह आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि जब तक विवाह कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तब तक कानून पति को ही बच्चे का स्वाभाविक पिता मानता है।

1. क्या था पूरा मामला? (The Case Background)

याचिका: एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जो अपने पति से अलग रह रही थी (लेकिन तलाक नहीं हुआ था)। उसने मांग की थी कि उसके बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में पिता के कॉलम से उसके पति का नाम हटाकर उसके ‘लिव-इन पार्टनर’ (प्रेमी) का नाम जोड़ा जाए।

तर्क: महिला का दावा था कि बच्चा उसके प्रेमी से पैदा हुआ है, इसलिए जैविक सच्चाई (Biological Truth) के आधार पर प्रमाण पत्र में सुधार होना चाहिए।

2. हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी (Court’s Observations)

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कई गंभीर सवाल उठाए:

कानूनी वैधता: कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 112 के तहत, यदि बच्चा विवाह के दौरान पैदा हुआ है, तो वह ‘वैध’ माना जाता है और पति ही उसका पिता है।

पति का अधिकार: पत्नी एकतरफा फैसला लेकर अपने पति को उसके पितृत्व के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। अगर पति पितृत्व को चुनौती देना चाहता है, तो उसे अदालत में डीएनए टेस्ट या अन्य सबूत पेश करने होंगे।

बच्चे का भविष्य: कोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह के बदलावों से बच्चे के भविष्य और उसकी कानूनी विरासत (Inheritance) पर बुरा असर पड़ सकता है।

3. ‘लिव-इन’ और शादी के बीच का अंतर

जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने स्पष्ट किया कि:”केवल इसलिए कि कोई महिला किसी अन्य पुरुष के साथ रह रही है, वह कानूनी दस्तावेजों में छेड़छाड़ करने की हकदार नहीं हो जाती। पितृत्व का निर्धारण केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं है, यह एक गंभीर कानूनी जिम्मेदारी है।”

4. पुरुषों के अधिकारों की सुरक्षा (Protection of Men’s Rights)

इस फैसले को ‘पुरुषों के अधिकारों’ (Men’s Rights) की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश उन मामलों में ढाल बनेगा जहाँ वैवाहिक विवादों के दौरान एक जीवनसाथी दूसरे को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या अधिकारों से वंचित करने की कोशिश करता है।

5. क्या है आगे का रास्ता?

अगर ऐसी स्थिति आती है जहाँ वास्तव में जैविक पिता कोई और है, तो इसके लिए ‘पितृत्व वाद’ (Paternity Suit) दायर करना होगा और उचित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही दस्तावेजों में बदलाव किया जा सकता है। नगर निगम या जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रार सीधे तौर पर ऐसे बदलाव नहीं कर सकते।

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