1911 से बंगाली समुदाय ने सर्व प्रथम मोतिहारी में आरंभ किया दुर्गा पूजा, पारंपरिक विधि विधान से होती है पूजा

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  • मूर्ति की ऊंचाई एवं आकार भारतीय नारी की औसतन उंचाई की होती है,      
  • हर हालत में मूर्ति का विसर्जन दसमी के दिन हो जाती है   
          अशोक वर्मा 
मोतिहारी : नगर के ज्ञान बाबू चौक स्थित भवानी मंडप में आज भी बंगाली समिति द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा आधुनिकता से दूर बिल्कुल दूर है। बंगाली पारंपरिक विधि विधान से पूजा होती है ,कोलकाता के ढोल मृदंग वादक अपने विशेष थाप और नृत्य  पर सभी को झूमा देते है।इस वर्ष भवानी मंडप की पूजा 114 वी वर्ष में प्रवेश कर गई।  बताया जाता है कि यह पूजा 1911 में उस समय आरंभ हुई जब बंगाली समुदाय के सरकारी कर्मी ब्रिटिश हुकूमत काल में तबादला होकर मोतिहारी  आए ।उनलोगो ने  स्थानीय लोगों को मिलाकर एक कमेटी बनाई जिसमे यमुना  प्रसाद साह नाबालिग  अग्रहरी एवं साह परिवार के अन्य लोग थे । यह पूजा हेनरी बाजार गोला मंडी में आरंभ हुआ कुछ वर्ष तक वहां चला उसके बाद इसका हस्तांतरण ज्ञान बाबू चौक भवानी मंडल में हुआ। उस दौर में देश के ख्याति लब्ध अधिवक्ता चितरंजन दास  मोतिहारी किसी केस में आए थे ,उन्होंने भवानी मंडप  के विकास के लिए मोटी रकम सहयोग के तौर पर दी थी उसके बाद ही भवानी मंडप का विकास हुआ और भवन बना ।इतिहास में उतर विहार का इसे प्रथम पूजा स्थल होने का गौरव प्राप्त  है ।प्रतिवर्ष कमेटी के निर्देशन में यहां पूजा विधि विधान से होती है ,रात्रि के समय सांस्कृतिक  आयोजन  होता  है ।प्रसाद के रूप में यहां का भोग सभी के लिए अधिक प्रिय होता है।सभी उसे लेने के लिए  ललाईत  रहते हैं।मूर्ति  का विसर्जन हर हालत मे दशमी के दिन पारंपरिक  बंगाली नृत्य ,शंख नाद एवं विशेष ध्वनी के साथ होता है।
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