महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू रामविलास सिंह ने आजादी की लड़ाई में सब कुछ न्योछावर कर दिया

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अशोक वर्मा।

मोतिहारी : स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के सेनानियो के त्याग बलिदान और संघर्ष की गाथा स्वर्णाक्षरों में अंकित है ।खुदीराम बोस,वीरकुअर सिह की भूमि विहार के सेनानियो ने लगातार संघर्ष किया है।चाहे सुगौली का सिपाही विद्रोह  हो या गांधी का चंपारण  सत्याग्रह, किशोर उम्र  से लेकर प्रौढ सेनानियो ने जान की परवाह नही की । पटना राजधानी से लेकर गया ,चंपारण ,जहानाबाद,समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर एवं मिथिला क्षेत्र हमेशा ही लहकता रहा,जेल मे जगह कम पड जाते थे। विहार का शायद ही कोई  ऐसा जिला होगा जहा सेनानियो के संघर्ष गाथा  चर्चा  मे न आया हो। विहार  के                                  महान  सेनानियो मे एक नाम आज भी बडे ही श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है वह है  गया के बाबू रामविलास  सिह।इन्होने देश को आजाद  करने मे अपना सब कुछ  न्योछावर  कर दिया और आजाद  भारत के नवनिर्माण  मे भी भरपुर सहयोग किया।इनके संघर्ष  का मुख्य  केंद्र  गया और जहानाबाद  था।  10 फरवरी 1894 मे गया मे जन्मे बाबू रामविलास  सिंह ने सेवा और संघर्ष मे संतुलन रखा।आजादी की लड़ाई  के दौरान जहानाबाद  के आसपास बापू के सत्य और अहिंसा  के मार्ग  पर चलते हुए  महिला सशक्तिकरण की दिशा मे कार्य  किया साथ- साथ स्वामी सहजानंद के नेतृत्व  वाले काश्त आदोलन से जुडे रहे तथा यमुना नदी के धारा को बांध कर किसानो के खेतो मे पानी पहूचाया।गांधी जी की सेवा संस्कृति को उन्होने जीवन मे धारण  किया।त्याग,तप,बलिदान का मिशाल बने राम विलास सिंह ने दलित उत्थान की दिशा मे हमेशा सेवारत रहे। वे समाज के लिए हमेशा  आदर्श बने रहे।जीवन भर खादी वस्त्र एवं गांधी टोपी धारण करने वाले बाबू रामविलास  सिंह हमेशा ही भ्रमण शील रहे।उनका ठौर हमेशा बदलता रहता था।चूकि वे अंग्रेजो के आंखो के किरकिरी थे इसलिए हमेशा ही कभी छीप कर तो कभी खुले रूप मे आदोलन चलाते थे।चंदे की राशी को किसी भी स्वदेशी आश्रम मे जमा कर देते थे,अपने पास नही रखते थे। रामविलास सिंह असहयोग आंदोलन में भी बढ़कर भाग लिए थे।1923 में लगान विरोधी आंदोलन उनके नेतृत्व में हुआ जो इन्हें एक अलग पहचान दिलाई ।आजादी की लड़ाई में प्रथम बार 1932 में इनकी गिरफ्तारी हुई और 2 माह के लिए जेल भेजे गए। गया के अनुमंडल अधिकारी ने अंग्रेजों क खिलाफत के कारण इन पर  मुकदमा दर्ज किया। सश्रम कारावास की सजा हुई । 31 अप्रैल को गया जेल से उनकी रिहाई हुई और उसके बाद इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई को और तेज कर दिया परिणाम यह हुआ कि 26 जनवरी 1933 को पुणः गिरफ्तार किए गए और केंद्रीय कारा गया मे भेजा गया ।इस बार 6 माह की सजा हुई। वे जेल में रहकर भी स्वतंत्रता संग्राम का अलख जगाते रहे। कुछ ही दिनों बाद पटना  कारगर  भेज दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद ये और उग्र हो गए और स्वतंत्रता संग्राम में लगे रहे ।यह समय उनके जीवन का उत्कर्ष काल था। बाबू रामविलास जी को ना कोई शान की कमी थी न ही धन की कमी थी लेकिन उन्होंने एक विद्रोही का जीवन अपनाया और भारत मां को आजादी दिलाने में अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया ।1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें सीधे आंदोलन के नेतृत्वकर्ता के संपर्क में आने का मौका मिला ।अगस्त क्रांति के क्रम में गया कलेक्ट्रेट पर झंडा फहराने का आंदोलनकारियो ने निर्णय लिया और इसका नेतृत्व रामविलास बाबू को मिला।गुप्त  अभियान  मे केशव बाबू को पिछले रास्ते छत पर चढा दिया गया।इन लोगो ने अंगरेजो का झंडा उतारकर तिरंगा फहरा दिया । इस बीच गोलिया चली और एक आंदोलनकारी शहीद हो गये। रामविलास सिंह के भी पैर में गोली लगी और वे बुरी तरह जख्मी हो गए। गोली के शिकार होकर घायल अवस्था में 14 दिनों तक विष्णुपद के नाले में पड़े रहे बाद में उनका इलाज हुआ और लंबी इलाज के बाद उनके  घाव भरे। रामविलास बाबू महात्मा गांधी ,भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, राजबल्लभ भाई पटेल ,सुभाष चंद्र बोस, सुचिता कृपलानी ,मौलाना आजाद ,डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता उनके आदर्श बन चुके थे और वे उन्हीं के नक्शे कदम पर आंदोलन में हमेशा सक्रिय बने रहे ।विदेशी वस्त्र की होली जलाना ,महिला शिक्षा दलित उत्थान तथा किसान आंदोलन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों से ये लगातार जुड़े रहे उन्होंने सहजानंद सरस्वती की अभिनंदन शर्मा तथा राहुल सांकृत्यायन के साथ मिलकर जमींदारी उन्मूलन में हमेशा सहयोग दिया ।आजादी के बाद  कांग्रेस पार्टी के अंदर कई विसंगतियां को देखते हुए उनका मोह भंग हो गया ।शिक्षण संस्थानों को आगे बढ़ाने में भी इनका मुख्य योगदान रहा।  मखदूम पूर्व उच्च विद्यालय ,संस्कृत महाविद्यालय एवं महाविद्यालयों की स्थापना में इनका सक्रिय योगदान रहा। उन्होने कभी भी झूठ को स्वीकार नहीं किया। छल कपट या अनैतिक कार्य से ये हमेशा दूर रहे ।आजादी के दो दशक बाद उन्होंने किसानों और स्कूलों के बीच अपने को समेट लिया और नए भारत के निर्माण में अपने नई शक्ति और ऊर्जा को लगातार लगाने का काम किया। उनके अंदर त्याग थी और एकमात्र लक्ष्य  उन्नत भारत समता मूलक भारत था। कभी भी उनके किसी भी कार्य में किसी भी जाति धर्म का खिलाफत नहीं हुआ बल्कि वे सारे भारतवासियों को एक मानते थे और सभी की सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे। उनहोने गीता के आदर्श को जीवन में अपनाया था। कर्म को सिर्फ कर्म समझ कर करना उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। नर सेवा को नारायण सेवा मानते थे तथा हर वक्त  जरूरतमंदों के लिए तन मन धन से खड़े रहते थे। बिनोवा भावे तथा जय प्रकाश नारायण और महात्मा गांधी उनके आदर्श रहे ।15 अगस्त 1972 को जब इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन योजना शुरू की तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ उन्हे ताम्रपत्र मिला और उन्होंने सूत का माला पहनकर गया की धरती में सम्मानित किया। बाबूराम विलास जी के यहां कभी भी कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण से पहुंच जाए और अगर उसे जिस चीज की जरूरत हो रामविलास बाबू  खाली हाथ नही लौटने  देते थे ।100 वर्ष की आयु में 7 सितंबर 1993 को उन्होंने अंतिम सांस ली। सबसे आश्चर्यजनक बात यह रहा कि जिस जेल में उन्होंने आंदोलन के दौरान सजा काटी थी उस जेल के गेट के पास एंबुलेंस में ही उनकी मृत्यु हुई । यह अपने आप में अनोखा दृश्य बन गया ।इनके पुत्र शिक्षा विद् रामप्रताप सिह भी अब दुनिया में तो नहीं रहे लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता रामविलास सिंह देश के लिए एक चरित्रवान और संवेदनशील  भरापुरा परिवार छोड़ गए हैं। रामविलास बाबू ने जो सपना भारत के लिए देखा था इस क्रांति का नाम राष्ट्र सृजन अभियान आज उनके पुत्र द्वारा चलाया जा रहा है। राष्ट्र सृजन अभियान के संस्थापक बाबू रामविलास सिह थे, उनका मूलमंत्र सेवा था। प्रधान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों को साकार करने में  उनके पुत्र डॉक्टर प्रधुमन कुमार सिन्हा अपने दादा के नक्शे कदम पर तन मन धन के साथ चल रहे हैं ।देश को आजाद हुए आज 78 वर्ष हुए जो एक बहुत बड़ी अवधि होती है। ऐसा प्रेक्टिकल मे देखा गया है कि  जिस देश के निवासी और सरकार ने उस देश के स्वतंत्रता सेनानी परिवार को प्रथम परिवार माना एवं उन्हें मान सम्मान प्रतिष्ठा के साथ हर समय उनकी सेवा में तत्पर रहे वह देश लगातार उन्नति के शिखर तक पहुंचता गया ।आज कनाडा जिसे आजाद हुए 150 वर्ष हुए उस देश में स्वतंत्रता सेनानी परिवार के 11वीं पीढ़ी का काफी मान सम्मान है। सरकार की तमाम सुविधाएं सेवाएं सेनानी परिवार के घर पर पहुंचाया जाता है, किसी भी कार्यालय में उस परिवार का अगर कोई भी किसी काम से पहूच गया तो उस कार्यालय के लोग  खड़े होकर उनका अभिवादन करके फौरन उनका काम कर देते है। विशव के अन्य देशो को उस देश से प्रेरणा  लेनी चाहिए। लेकिन भारत के लिए बहुत शर्मनाक बात है कि आज भले ही सरकार दूसरी पीढ़ी को स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी मानती है लेकिन सुविधा के नाम पर नगण्य है ।यहां तक की जिस स्वतंत्रता सेनानी को पेंशन मिलता था  आज लगभग सभी समाप्त हो चुके है , चंद स्वतंत्रता सेनानी ही बचे हुए हैं  उनकी पेंशन की राशि सरकारी खजाने मे पडी रह जा रही है। और सरकारी खजाने में  लेकिन सरकार स्वतंत्रता सेनानी परिवार की सूधी नहीं ले रही है।देश मे स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी पेंशन  लागू नही हुआ।आजादी के बाद देश ने बहुत कुछ विकास किया और आज विकसित राष्ट्रों के पंक्ति में भारत आ चुका है लेकिन देश ने अगर सबसे बड़ा चीज खोया है वह है नैतिक मूल्यों का ह्रास होना। देश के नेता, धर्म गुरु, सामाजिक क्षेत्र के लोग किसी के बातो का कोई प्रभाव देश के नागरिक पर नहीं पड़ रहा है, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि  प्रवचन करने वाले लोगों का व्यक्तित्व वह नहीं है जो होना चाहिए।  उनके कथनी और करनी में फर्क है , गांधी सामान उनमे एकरूपता  नहीं है।  अभी भी समय है अगर  देश की सरकार स्वतंत्रता सेनानी  परिवार को देश का प्रथम परिवार मानकर उनके भरपुर सम्मान दे,सुख सुविधा का ख्याल करें तो एक बार पूरे देश में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हो सकती है और अपना भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया तथा विश्व गुरु बन सकता है  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की जो परिकल्पना है वह राष्ट्र तभी बनेगा जब राष्ट्र के निर्माता स्वतंत्रता सेनानी परिवार के प्रति सरकार का दृष्टिकोण बदले और उनके लिए तमाम तरह की सुविधा और पेंशन उपलब्ध कराया जाए । इसका प्रभाव देश की नई पीढी के साथ तमाम लोगों पर पड़ेगा और देश वासियो  मे  नए सिरे से राष्ट्रीयता का प्रवाह होगा।

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