Live News 24×7 के लिए कैलाश गुप्ता की रिपोर्ट।
पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को तैयार है। 2025 के विधानसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है, और इसके साथ ही प्रदेश की सियासी सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं। कई विधानसभा सीटें इस बार विशेष रणनीतिक महत्व रखती हैं, जिनमें सारण जिले की एकमा विधानसभा सीट का राजनीतिक तापमान सबसे अधिक महसूस किया जा रहा है। जातीय संतुलन, सामाजिक पकड़ और राजनीतिक सक्रियता के त्रिकोण पर टिकी यह सीट अब एनडीए के भविष्य का एक प्रतीक बन चुकी है।
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में हैं—कामेश्वर सिंह मुन्ना, जो लोजपा (रामविलास) के वरिष्ठ नेता हैं और पिछले दो दशकों से एकमा क्षेत्र में राजनीतिक व सामाजिक रूप से निरंतर सक्रिय रहे हैं। उनकी पहचान केवल एक राजनेता की नहीं, बल्कि एक जननायक के रूप में बनी है—जो जनमानस की भावनाओं को न केवल समझते हैं, बल्कि उसे स्वर भी देते हैं।
भाजपा को एकमा में बढ़त दिलाने वाले सूत्रधार
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा प्रत्याशी जनार्दन सिंह सिग्रीवाल को एकमा क्षेत्र में मिली निर्णायक बढ़त के पीछे एक बड़ा नाम कामेश्वर सिंह मुन्ना का रहा। बूथ प्रबंधन से लेकर कार्यकर्ताओं की लामबंदी और स्थानीय स्तर पर समन्वय—हर स्तर पर मुन्ना की रणनीति और सक्रियता ने भाजपा को मजबूती दी। जबकि दूसरी ओर, पूर्व विधायक मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल खुलेआम कांग्रेस प्रत्याशी के लिए प्रचार करते दिखे, जिससे एनडीए की छवि को क्षति पहुंची।
जातीय समीकरण और सामाजिक पकड़
एकमा का जातीय समीकरण भी इस सीट को विशिष्ट बनाता है। यहां राजपूत मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, उसके बाद यादव और अन्य पिछड़ी जातियों का प्रभाव है। कामेश्वर सिंह मुन्ना इस समीकरण में सबसे संतुलित चेहरा हैं, जिनकी स्वीकार्यता जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक सर्वजन नेता की छवि गढ़ चुकी है। यही कारण है कि उनका समर्थन न केवल सवर्णों में, बल्कि पिछड़ी जातियों में भी व्यापक है।
एनडीए में टिकट बंटवारे की चुनौती
एनडीए के भीतर टिकट को लेकर रस्साकशी शुरू हो चुकी है, लेकिन इस बार चुनाव सिर्फ संगठनगत समीकरणों का नहीं, बल्कि जनभावनाओं के सम्मान का भी है। जनता अब वादों से नहीं, काम और कर्तव्यों से प्रभावित होती है। ऐसे में यदि एनडीए नेतृत्व कामेश्वर सिंह मुन्ना जैसे ज़मीनी और समर्पित नेता पर भरोसा जताता है, तो यह सीट जीतना मात्र औपचारिकता बन जाएगी।
इसके विपरीत, यदि नेतृत्व फिर से उन चेहरों को आगे लाता है जिनकी प्रतिबद्धता संदेह के घेरे में है—जैसे कि धूमल सिंह, जिन पर कांग्रेस को अघोषित समर्थन देने के आरोप हैं—तो यह निर्णय एनडीए के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
जनता की पसंद और नेतृत्व की परीक्षा
इस चुनाव में एकमा की लड़ाई सिर्फ एक सीट जीतने की नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि एनडीए अपने कार्यकर्ताओं की निष्ठा और जनता की भावनाओं को कितना महत्व देता है। कामेश्वर सिंह मुन्ना का अब तक का राजनीतिक जीवन, उनकी सेवा भावना और क्षेत्र में गहरी पैठ, उन्हें न सिर्फ एक बेहतर विकल्प बनाते हैं, बल्कि सबसे सक्रिय और भरोसेमंद उम्मीदवार भी सिद्ध करते हैं।
अब गेंद नेतृत्व के पाले में है—क्या वे इस बार पारंपरिक समीकरणों से ऊपर उठकर जनता की स्पष्ट मंशा को पहचान पाएंगे? एकमा का फैसला केवल क्षेत्रीय समीकरण नहीं, बल्कि एनडीए की राजनीतिक दिशा और दृष्टि तय करने वाला साबित हो सकता है।
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