- म्पारण के लाल ने हिंदी को विश्व भाषा बनाने का लिया संकल्प, 16 वर्षों से अनवरत कर रहे हिंदी सेवा
अशोक वर्मा
मोतिहारी : हिंदी को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करने के लिए पिछले दो दशकों से निरंतर सक्रिय चम्पारण के लाल डॉ. नन्दकिशोर साह को प्रथम अंतरराष्ट्रीय राजभाषा शिखर सम्मेलन में प्रतिष्ठित ‘भाषा रत्न सम्मान-2026’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान ओडिशा के महामहिम राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति ने सीएसआईआर-आईएमएमटी, भुवनेश्वर में प्रदान किया।
पूर्वी चम्पारण के बनकटवा प्रखंड के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे डॉ. साह ने छात्र जीवन से ही सामाजिक सरोकार और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। राष्ट्रीय सेवा योजना के सर्वश्रेष्ठ स्वयंसेवक से लेकर जीविका, बिहार और वर्तमान में यूपीएसआरएलएम के माध्यम से उन्होंने लाखों ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सामाजिक सेवा के साथ-साथ हिंदी के प्रचार-प्रसार और संवर्धन के क्षेत्र में भी डॉ. साह का योगदान उल्लेखनीय रहा है। पिछले 16 वर्षों से वे निरंतर हिंदी लेखन, देश-विदेश में आयोजित विभिन्न सेमिनारों में शोध-पत्र प्रस्तुत करने तथा ‘किताब से संवाद’ जैसे अभिनव कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
डॉ. साह का स्पष्ट मानना है कि भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओं को साथ लेकर ही हिंदी को विश्व भाषा के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसी विचार को उन्होंने अपने हिंदी सेवा अभियान का मूल मंत्र बनाया है।
चार पुस्तकों के लेखक
डॉ. नन्दकिशोर साह की प्रमुख प्रकाशित पुस्तकों में ‘सफलता का सोपान : इंटरव्यू’, ‘यादों के झरोखों से : बापू’, ‘समावेशी विकास में शिक्षा और समाज’ तथा ‘आधुनिक साक्षात
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