हिजाब विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर भड़के असदुद्दीन ओवैसी, इसे इस्लाम पर बताया सीधा हमला

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देश भर में धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और पहनावे की आजादी को लेकर छिड़ी बहस के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ओवैसी ने अदालत के इस फैसले को सीधे तौर पर इस्लाम और धार्मिक स्वतंत्रता पर करारा हमला करार दिया है। हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक आक्रामक तेवर अपनाते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी नागरिक को यह बताने का हक नहीं है कि उसे कौन सा मजहब अपनाना चाहिए और कैसा पहनावा पहनना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय पर आया है जब देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर हिजाब व अन्य धार्मिक परिधानों को लेकर नियमों और विनियमों पर कानूनी और सामाजिक स्तर पर लगातार बड़ी बहस छिड़ी हुई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ ओवैसी का तीखा प्रहार

असदुद्दीन ओवैसी ने सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय की कड़ी आलोचना की है जिसमें धार्मिक प्रतीकों या विशेष पोशाक से जुड़े नियमों पर फैसला सुनाया गया था। ओवैसी का आरोप है कि इस तरह के न्यायिक फैसले देश के संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिए गए मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल भावना के खिलाफ जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का संविधान अपने हर नागरिक को अपनी आस्था, संस्कृति और परंपरा के अनुसार जीने और अपने धर्म के पालन की पूरी स्वतंत्रता प्रदान करता है। ओवैसी के इस बयान ने एक बार फिर से देश की सियासत में धार्मिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक फैसलों की परिधि को लेकर एक राष्ट्रीय बहस को हवा दे दी है, जिसके बाद विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों के बीच प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।

पहनावे की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर छिड़ी राष्ट्रव्यापी बहस

हिजाब और अन्य धार्मिक व पारंपरिक परिधानों का मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा है। एक तरफ जहां न्यायपालिका और शिक्षण संस्थानों के प्रशासनों का यह तर्क होता है कि अनुशासन, समानता और एकरूपता बनाए रखने के लिए संस्थानों के अपने नियम और ड्रेस कोड होने चाहिए, वहीं दूसरी तरफ ओवैसी जैसे नेताओं और मानवाधिकार समर्थकों का यह स्पष्ट मानना है कि धार्मिक पहचान को दबाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा प्रतिबंध है। ओवैसी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि एक लोकतांत्रिक देश में सरकार या अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि महिलाएं क्या पहनेंगी और उन्हें अपने मजहब का पालन कैसे करना चाहिए। इस तीखे वैचारिक मतभेद के कारण समाज का एक वर्ग इस फैसले को समानता की दृष्टि से सही मान रहा है, तो दूसरा वर्ग इसे धार्मिक स्वतंत्रता में सीधा हस्तक्षेप बता रहा है।

राजनीतिक नफा-नुकसान और आने वाले दिनों में बढ़ते राजनीतिक समीकरण

असदुद्दीन ओवैसी के इस आक्रामक रुख को आगामी राजनीतिक और चुनावी रणनीतियों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। ओवैसी हमेशा से मुस्लिम समुदाय के अधिकारों, पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर मुखर होकर बोलते आए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से एक तरफ जहां उनके पारंपरिक वोट बैंक में उनकी पकड़ और मजबूत होती है, वहीं दूसरी तरफ यह राष्ट्रीय राजनीति में ध्रुवीकरण के मुद्दों को भी हवा देता है। सत्तारूढ़ दल और अन्य राजनीतिक पार्टियां इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले और उस पर ओवैसी की इस कड़ी आपत्ति ने एक बार फिर से इस संवेदनशील मुद्दे को देश के मुख्यधारा के राजनीतिक पटल पर ला खड़ा किया है, जिसका असर आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ना तय माना जा रहा है।

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