- इनमें अपार भक्ति और मंत्रों की शक्ति है मौजूद।
डॉ रामानुज।
गयाजी, बिहार (सं दृ) : गयाजी में एक ऐसे भी व्यक्ति हैं जो साधक हैं, साधना तो करते हैं लेकिन कोई उनके बारे में जानता नहीं, पुजारी हैं.. पुजा तो करते हैं लेकिन कोई उन्हें पुजा करते देखता नहीं, बहुत बड़ा चोर हैं.. राम नाम की चोरी तो करते हैं लेकिन चोरी करते उन्हें कोई देखता नहीं। ये कहानी नहीं बल्कि एक हकीकत है, जहानाबाद जिला के हुलासगंज थानांतर्गत आनेवाले गांव बिहटा के सच्चिदानंद पाठक की।
बिहटा गांव के एक किसान परिवार में स्व सूर्यमणि देवी एवं स्व विद्यानंद पाठक के घर जन्में सच्चिदानंद पाठक अपने 6 भाई बहनों में सबसे बड़े हैं। इनके नाम से ही ज्ञात होता है कि सत् और चित् का आनंद लेने वाले व्यक्ति।सच्चिदानंद नाम का अर्थ “सत्य, चेतना, और आनंद” जो एक परम वास्तविकता यानी ब्रह्म का वर्णन करता है।
*परम हनुमान भक्त हैं सच्चिदानंद* :
यदि सच्चिदानंद की भक्ति की बात करें तो हरवक्त ये हनुमान जी की भक्ति में लीन रहते हैं। हनुमान जी की भक्ति के साथ साथ राम कथा सुनना एवं सुनाना, श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करना इत्यादि।
डॉ विजय कुमार करण के अनुसार – सच्चिदानंद पाठक जी के शिष्य शहर के जाने माने प्रसिद्ध बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ विजय कुमार करण कहते हैं कि मैं इन्हें पिछले लगातार कई वर्षों से हनुमान जी की भक्ति में देख रहा हूं। जहां तक जनता हूं कि ये पिछले 50 वर्षों से लगातार बिना भुले धूमधाम से हनुमानजी का जन्म दिवस मनाते आ रहे हैं।
*क्या कहते हैं सच्चिदानंद पाठक* : बातचीत में पाठक जी ने बताया कि मेरी मां कहा करती थी कि बेटा जब तुम रोते थे तो तुम्हें लोरी इत्यादि सुनाने के बाद भी चुप नहीं होते थे। रात को एक दिन तुम बहुत रोने लगे, चुप नहीं हो रहे थे तो मैं बहुतव्याकुल हो हनुमान जी के शरण में गई। हनुमान जी के पास जाते ही तुम चुप हो गए, उसके बाद जब रोने लगते तो मैं हनुमान चालीसा, हनुमान कथा या फिर हनुमान जी से जुड़ी कोई कहानी कहने लगती तो तुम चुप हो जाते और थोड़ी देर बाद सो जाते। बाल्या अवस्था में ही हनुमान जी की भक्ति देखकर मां खुश होती रहती थी। बाद में 1972 में जब इंटरमीडिएट के छात्र थे तो इन्हें इनकी मां ने गुरु मंत्र के रूप में हनुमान जी का मंत्र दी। एक साल बाद 1973 में पाठक जी बिहार पुलिस में दारोगा बन गए लेकिन मनोनुकूल नौकरी नहीं होने के कारण कुछ ही दिनों में ये त्याग पत्र दे दिए। 1974 में मैं कुसुम देवी के साथ परिणय सूत्र में बंधने के बाद वैवाहिक जीवन प्रारंभ करने के साथ ही एक नई उमंग, नई जिम्मेदारी, और नई कहानी की शुरुआत नए तरीके से की। पुनः 1978 में यू डी सी के प्रतियोगिता परीक्षा में सम्मिलित हुआ तथा 1980 में परिणाम आने के बाद पंजाब नेशनल बैंक में अपना योगदान दिया। लगभग 35 वर्षों की सेवा के पश्चात् 2014 में पंजाब नेशनल बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय से अवकाश प्राप्त कर गृहस्त आश्रम में रहते हुए भी एक संन्यासी की जीवन जीने लगा। आगे भावुक मन से बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्नी की इच्छा मृत्य का वरदान होने के कारण वो मुझे बीमार होने का बहाना बना अकेले छोड़ कर चली गई।
*समाज की नजर में* : पाठक जी एक कुशल गृहस्थ होने के साथ साथ सच्चे इंसान भी हैं। अपने भक्ति के बल पर कई ऐसे असंभव कार्य को भी संभव किया है, इनके आशीर्वाद प्राप्त कर अनेकों लोग अच्छे जगहों पर चले गए फिर भी अपना श्रेय इन्होंने कभी नहीं लिया और न ही ये कभी प्रचार प्रसार के पीछे भागे। सादा जीवन जीने वाले सच्चिदानंद पाठक जी का जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम होगा।
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