अनूप नारायण सिंह।
जब समाज नशे की चपेट में फँसता है, तो केवल व्यक्ति ही नहीं, परिवार, पीढ़ियाँ और भविष्य – सब कुछ दांव पर लग जाता है। ऐसे समय में कोई एक उठता है, जो अपनी पीड़ा को ताक़त बनाकर दूसरों के लिए रौशनी की मिसाल बनता है। विशाल राय ऐसे ही एक नाम बनकर उभरे हैं।
गोपालगंज जिले के हथुआ प्रखंड के सेमराव गांव से आने वाले विशाल राय ने नशे की अंधेरी गलियों से निकलकर न सिर्फ अपनी ज़िंदगी बदली, बल्कि अब वे दूसरों के जीवन में भी उजाला भर रहे हैं।
एक समय था जब विशाल खुद नशे की गर्त में डूब चुके थे। उनके जीवन की दिशा खत्म सी लग रही थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। खुद को खड़ा किया, सुधारा और फिर वही राह चुनी जिस पर चलने से अधिकतर लोग कतराते हैं – दूसरों को नशे से बाहर निकालने की राह।
हाल ही में पटना के उड़ान नशा मुक्ति केंद्र में जब विशाल राय पहुँचे, तो वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने न सिर्फ एक मोटिवेशनल स्पीकर को देखा, बल्कि एक ऐसे योद्धा को महसूस किया जो उन्हीं की तरह इस अंधेरे से लड़ चुका है। उन्होंने जब अपनी कहानी साझा की, तो यह किसी भाषण से अधिक एक सच्चाई थी – खुरदुरी, तकलीफ़देह, लेकिन प्रेरणादायक।
विशाल ने यह दिखा दिया कि पुनरुत्थान केवल किताबों का शब्द नहीं, बल्कि हकीकत हो सकता है – अगर इरादा सच्चा हो और राह स्पष्ट हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नशे से मुक्ति कोई जादू नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है – जिसमें समाज, परिवार, व्यवस्था और व्यक्ति, सभी की भूमिका जरूरी है।
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ नशा एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुका है, वहाँ विशाल राय जैसे अभियानकर्ता उम्मीद की वह लौ हैं, जिसे बुझने नहीं दिया जा सकता। लेकिन सवाल यह है – क्या हम, क्या प्रशासन, क्या समाज उस लौ को हवा देने को तैयार हैं?
इस अभियान को महज़ एक व्यक्तिगत प्रयास न बनने दें। यह समय है कि हम नशा विरोधी अभियानों को केवल भाषणों या सरकारी योजनाओं तक सीमित न रखें। ज़रूरत है जमीनी स्तर पर काम करने वाले योद्धाओं की आवाज़ को पहचानने की, और उन्हें हर संभव समर्थन देने की।
विशाल राय की कहानी हमें यह सिखाती है —
गिरना अपराध नहीं है, लेकिन उठने की कोशिश न करना ज़रूर है।
नशे से आज़ादी केवल एक सपना नहीं, एक लक्ष्य है। और इसे पाने के लिए हर विशाल राय की जरूरत है — और हर समाज की ज़िम्मेदारी भी।
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