“नकली आचार्य” पर भारी पड़ेंगे “असली आचार्य”: सोनपुर में दिलचस्प राजनीतिक मुक़ाबले की आहट

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लेखक: अनूप नारायण सिंह
बिहार की राजनीति के इतिहास में सोनपुर विधानसभा क्षेत्र इस बार एक अनोखे और दिलचस्प राजनीतिक मुकाबले का गवाह बनने जा रहा है। यहां ‘आचार्य बनाम आचार्य’ की लड़ाई तय मानी जा रही है, लेकिन दोनों आचार्य केवल नाम से समान हैं, असल में दोनों की पृष्ठभूमि, कार्यशैली और जनसंपर्क का स्तर बिल्कुल अलग है।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य, जो हाल ही में सारण लोकसभा से चुनाव लड़ीं और हार का सामना करना पड़ा, अब सोनपुर से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। पर विडंबना यह है कि चुनाव हारने के बाद से ही वे पूरे क्षेत्र से लगभग गायब हैं। जिन मतदाताओं के घर-घर जाकर वोट मांगे थे, अब वे उन्हीं गलियों की शक्ल तक देखने नहीं आई हैं। न कोई सामाजिक सहभागिता, न कोई जनसंवाद। आम लोग अब उन्हें ‘पैराशूट उम्मीदवार’ कहने से भी नहीं हिचकते।
इसके उलट, डॉ. आचार्य राहुल परमार का कद लगातार सोनपुर में बढ़ता जा रहा है। उनका सरनेम नहीं, उनका कर्म बोलता है। राहुल परमार सिर्फ नाम के ‘आचार्य’ नहीं हैं, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में आचार्य की उपाधि अर्जित की है और उसी ज्ञान को समाज में उतारने का काम किया है।
वे पिछले कुछ वर्षों से सोनपुर विधानसभा क्षेत्र में कई जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। चाहे गंगा किनारे के गांवों में बाढ़ राहत अभियान हो, या शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर जनजागरूकता—राहुल परमार की मौजूदगी हर मोर्चे पर दिखती है। वे कैदियों के अधिकारों की आवाज़ भी बन चुके हैं, और युवाओं के लिए रोजगार और स्किल डेवलपमेंट से जुड़े कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी बढ़ती जा रही है।
गरीबों के बीच कंबल वितरण, किसानों के लिए एमएसपी पर संवाद, नशा उन्मूलन अभियान, और यहां तक कि स्थानीय स्कूलों में लाइब्रेरी निर्माण तक—राहुल परमार ने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया है, ना कि सिर्फ सत्ता की सीढ़ी।
जहाँ एक ओर रोहिणी आचार्य केवल अपने खानदान की राजनीतिक विरासत के सहारे मैदान में हैं, वहीं राहुल परमार ने सोनपुर की धरती को अपने खून-पसीने से सींचा है। उनकी भाषण शैली में ज्ञान है, और चाल में आत्मविश्वास। वे नारे नहीं, नीति और नीयत से बात करते हैं।
इस बार की लड़ाई सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच नहीं, दो सोचों के बीच है—और सोनपुर की जनता इस फर्क को समझ भी रही है और याद भी रखेगी।
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