बुझते जीवन  मे कुम्हारो को दिपावली है रहती है आमद की उम्मीद।

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अशोक वर्मा

मोतिहारी :  जैसे -जैसे आधुनिक सुख सुविधा के साधन आते गये पारंपरिक रोजी रोटी के साधन समाप्त होते गये।उसी श्रेणी  मे आता है मिट्टी के रचनाकार कुम्हारो का पारंपरिक वर्तन ,दीया आदि बनाने का कार्य। पहले तो कुम्हारो पर अल्युमिनियम ने हमला किया उसके बाद स्टील के बर्तन आए और अब प्लास्टिक युग मे तो कुम्हारो का रोजगार एक तरह से  बंद होता जा रहा है ।पहले शादी ब्याह के मौके पर मिट्टी के चुक्कड में पानी देने की परंपरा थी, वह समाप्त हो गई वहां भी प्लास्टिक का ग्लास अपना  वर्चस्व  कायम कर लिया ।वैसे कुछ वर्ष पहले बिहार के बड़े राजनेता ने रेलवे में मिट्टी के चुक्कड में चाय देना अनिवार्य कर दिया था इसका कुछ लाभ कुम्हारो को हुआ और अंतिम सांस  लेने वाले कुम्हारो को नया जीवन मिला ।उनका रोजगार  फिर जिंदा हुआ लेकिन यह सिस्टम भी बंद हो गया और अब  आधुनिकता के मार से कुम्हार कराह रहे हैं। एक समय था मोतिहारी के पश्चिमी उत्तरी भाग में सड़क के किनारे कई कुम्हारो का  मिट्टी  बर्तन निर्माण का कार्य होता था लेकिन आज खोजने से  अब नहीं  मिल पाते है।नगर से काफी दूर चैलाहा गांव में एक परिवार मिला जहां मिट्टी के दीए बन रहे थे।शिवनाथ के साथ उसकी पत्नी भी सहयोगी थी ।बातचीत में उसने बताया कि अब तो हम लोग उस काम को लगभग बंद कर चुके हैं। मेरा बेटा बाहर कमाने चला गया, मैं अब बाहर  जाने लायक नही हू  इसलिए  दिवाली के मौके पर कुछ काम कर लेता हूं जिससे  कुछ पैसे आ जाते हैं। मेरे ऊपर कुछ कर्ज है जिसे दिवाली में मैं कुछ उतार पाऊंगा इसी के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा हूं।  दीया के साथ छठ के लिए  कोसी ,चौमुख आदि बना रहा हू। मौके पर मिले हरिशंकर प्रसाद ने बताया कि मेरे गांव में भी कई कुम्हार थे लेकिन सभी  इस बिजनेस को बंद कर दिए हैं और उनके बच्चे इस कार्य को करना नहीं चाहते।सब बाहर कमाने निकल गए है। कुल मिलाकर वर्तमान दौर में कुम्हारो का जीवन कष्टमय  है ।उनका पारंपरिक व्यवसाय बंद हो चुका है , अब सिर्फ सिजिनल कार्य  होता है।कायदे से सरकार को इन लोगों को मुआवजा भी देना चाहिए या फिर उन्हें किसी अन्य कार्य में प्रशिक्षण देकर के लगाना चाहिए ताकि उनकी आर्थिक स्थिति  डामाडोल नहीं हो और वे जी सके ।

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