अब नई NCERT किताबों में पढ़ाई जाएगी ‘राम राज्य’ और संसद के सेंगोल की गौरवशाली गाथा

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भारतीय शिक्षा प्रणाली और स्कूली पाठ्यक्रम (School Curriculum) में एक ऐतिहासिक और बड़े बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, जो देश के करोड़ों छात्रों के वैचारिक और सांस्कृतिक विकास में मील का पत्थर साबित होने जा रही है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी (NCERT) ने शैक्षणिक सत्र के मद्देनजर स्कूली किताबों में एक बार फिर से बहुत बड़े और महत्वपूर्ण अपडेट किए हैं। ताजा बदलावों के तहत अब देश भर के स्कूलों में कक्षा 9 के छात्रों को भारतीय इतिहास, संस्कृति और शासन प्रणाली की गहराई से रूबरू कराने के लिए ‘राम राज्य’ के आदर्शों और भारतीय संसद के नए भवन में स्थापित पवित्र ‘सेंगोल’ (Sengol) के इतिहास को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को भारत की प्राचीन लोकतांत्रिक परंपराओं, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ना है, ताकि वे अपनी जड़ों पर गर्व महसूस कर सकें। शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में इस बदलाव को लेकर इस वक्त देश भर में व्यापक चर्चाएं चल रही हैं, और हर अभिभावક तथा छात्र यह जानने के लिए उत्सुक है कि आखिरकार नई किताबों में क्या-क्या नए अध्याय जोड़े गए हैं और उनका छात्रों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ेगा। आज के इस विस्तृत और विश्लेषणात्मक आलेख में हम आपको एनसीईआरटी की इस नई पाठ्यचर्या, ‘राम राज्य’ और ‘सेंगोल’ से जुड़े नए अध्यायों की पूरी जानकारी और इसके पीछे के उद्देश्यों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

एनसीईआरटी की नई किताबों में ‘राम राज्य’ के आदर्शों का समावेश और उसका उद्देश्य

एनसीईआरटी द्वारा कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान और इतिहास से जुड़े पाठ्यक्रमों में किए गए इन ताजा संशोधनों के तहत ‘राम राज्य’ (Ram Rajya) के प्रशासनिक, नैतिक और सामाजिक स्वरूप को बहुत ही सुंदर ढंग से छात्रों के सामने प्रस्तुत किया गया है। सदियों से भारतीय जनमानस में ‘राम राज्य’ का अर्थ एक ऐसे आदर्श शासन, न्यायप्रिय व्यवस्था और सर्वसमावेशी समाज से लगाया जाता है जहां किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं होता, राजा से लेकर प्रजा तक सभी के लिए कानून और धर्म समान होते हैं, और समाज में पूर्ण शांति तथा समृद्धि का वास होता है। नई किताबों में इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया है कि किस प्रकार भगवान राम के शासनकाल के वे मूल्य आज के आधुनिक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्यों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं। छात्रों को केवल राजा-महाराजाओं की लड़ाइयों और राजनीतिक इतिहास तक सीमित रखने के बजाय, उनके भीतर नैतिक साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करने के लिए इस प्राचीन अवधारणा को पाठ्यक्रम में शामिल करना एक बहुत ही सराहनीय और दूरदर्शी कदम माना जा रहा है।

संसद भवन के पवित्र ‘सेंगोल’ की कहानी अब स्कूली बच्चे इतिहास की किताबों में पढ़ेंगे

नई एनसीईआरटी की किताबों का दूसरा सबसे बड़ा और आकर्षक आकर्षण देश की नई संसद के सेंगोल (Sengol History in NCERT) से जुड़ा हुआ है। जब देश को 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली थी, तब सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में तमिलनाडु के चोल राजवंश की प्राचीन परंपरा से जुड़े इस पवित्र राजदण्ड ‘सेंगोल’ को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया था, जिसे हाल ही में देश के नए संसद भवन में स्पीकर की कुर्सी के पास पुनः स्थापित किया गया है। अब कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में छात्र इस बात की विस्तृत जानकारी पढ़ेंगे कि कैसे यह राजदंड भारतीय संस्कृति, न्याय, पारदर्शिता और संप्रभुता का प्रतीक रहा है। इस अध्याय को जोड़ने के पीछे सरकार और शिक्षाविदों का यह उद्देश्य है कि देश के युवा यह समझ सकें कि हमारी आज की शासन व्यवस्था किस प्रकार प्राचीन भारतीय परंपराओं और मूल्यों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। इतिहास के पन्नों में दब चुके इन महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीकों को पुनर्जीवित कर स्कूली बच्चों तक पहुंचाना वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में डी-कॉलोनाइजेशन (Decolonisation) की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

पाठ्यक्रम में अन्य कौन-कौन से नए बदलाव और वैचारिक संशोधन किए गए हैं?

‘राम राज्य’ और ‘सेंगोल’ के अलावा एनसीईआरटी की इन नई किताबों में भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge Systems – IKS), प्राचीन विज्ञान, गणित, दर्शन और भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों के योगदान को भी प्रमुखता से जगह दी गई है जिन्हें पहले की किताबों में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया था। शिक्षा मंत्रालय और पाठ्यक्रम समिति का यह मानना है कि जब तक देश के बच्चे अपनी मातृभूमि के वास्तविक इतिहास, कला, संस्कृति और तकनीकी उपलब्धियों से परिचित नहीं होंगे, तब तक उनका समग्र बौद्धिक विकास अधूरा रहेगा। नई पाठ्यपुस्तकों में भाषा को अधिक सरल, रोचक और तार्किक बनाया गया है ताकि छात्र रटने की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर चीजों को गहराई से समझ सकें। इन बदलावों को लागू करने के लिए शिक्षकों के लिए भी विशेष कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं ताकि वे इन नए विषयों को छात्रों को पूरी संवेदनशीलता और तथ्यात्मक सटीकता के साथ पढ़ा सकें।

शिक्षाविदों, अभिभावकों और छात्रों की प्रतिक्रिया: एक सकारात्मक और दूरगामी कदम

एनसीईआरटी के इस कदम का देश भर के अधिकांश शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और अभिभावकों ने खुले दिल से स्वागत किया है। उनका यह कहना है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में पिछड़ रही हमारी सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने का सबसे सही तरीका यही है कि स्कूली स्तर पर ही बच्चों को इन महान परंपराओं से जोड़ा जाए। हालांकि, कुछ हलकों में इसको लेकर वैचारिक बहस भी देखने को मिल रही है, लेकिन कुल मिलाकर छात्रों और शिक्षकों के बीच इन नए अध्यायों को पढ़ने को लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है। आने वाले नए शैक्षणिक सत्र में जब छात्र इन किताबों के जरिए ‘राम राज्य’ के न्यायपूर्ण सिद्धांतों और ‘सेंगोल’ की ऐतिहासिक यात्रा को पढ़ेंगे, तो उनके भीतर देश प्रेम और सांस्कृतिक गौरव की भावना और अधिक मजबूत होगी। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था अब अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी स्वदेशी और मौलिक पहचान की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है।

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