पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे मजबूत किले यानी ‘अल्पसंख्यक वोट बैंक’ में बड़ी दरार पड़ती नजर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा ‘मुस्लिम पक्ष’ की राजनीति को धार देने और कई छोटी मुस्लिम पार्टियों के साथ आने की सुगबुगाहट ने दीदी के चुनावी गणित को उलझा दिया है। सियासी जानकारों का मानना है कि यदि यह ‘मुस्लिम मोर्चा’ एकजुट होकर चुनाव लड़ता है, तो राज्य की 114 सीटों पर टीएमसी के लिए जीत की राह बेहद कठिन हो सकती है।
1. हुमायूं कबीर: अपनों ने ही खोला मोर्चा
मुर्शिदाबाद के भरतपुर से टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर पिछले काफी समय से अपनी ही सरकार के खिलाफ हमलावर हैं।
नया समीकरण: कबीर लगातार मांग कर रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय को उनकी आबादी के अनुपात में सत्ता और टिकटों में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
दबाव की राजनीति: उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी (ISF) और अन्य मुस्लिम संगठनों के साथ मिलकर एक नया विकल्प पेश कर सकते हैं।
2. 114 सीटों का ‘जादुई’ और ‘घातक’ आंकड़ा
पश्चिम बंगाल की कुल 294 सीटों में से करीब 114 सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम मतदाता हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
मालदा-मुर्शिदाबाद-उत्तर दिनाजपुर: इन तीन जिलों में मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है। यहाँ की लगभग सभी सीटों पर अब तक टीएमसी का एकछत्र राज रहा है।
वोटों का बिखराव: यदि हुमायूं कबीर जैसा चेहरा अलग मोर्चा बनाता है, तो मुस्लिम वोटों का सीधा बंटवारा होगा। इसका सीधा फायदा भाजपा (BJP) को मिल सकता है, क्योंकि हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोटों का बिखराव भगवा दल के लिए ‘जीत का मंत्र’ साबित हो सकता है।
3. ‘दीदी’ के लिए दोहरी चुनौती
ममता बनर्जी के सामने इस बार चुनौती केवल भाजपा से नहीं, बल्कि घर के भीतर से उठ रही इस आवाज से भी है:
अल्पसंख्यक असंतोष: नागरिकता (CAA/NRC) के मुद्दे पर सुरक्षा का भाव देने वाली ममता पर अब ‘सिर्फ वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल करने के आरोप लग रहे हैं।
भाईजान फैक्टर: आईएसएफ (ISF) का बढ़ता प्रभाव दक्षिण 24 परगना जैसे इलाकों में टीएमसी को पहले ही नुकसान पहुँचा चुका है।
4. क्या होगा आगामी चुनावों पर असर?
अगर 114 सीटों पर मुस्लिम वोटों का महज 10-15% हिस्सा भी इस नए मोर्चे की तरफ शिफ्ट होता है, तो टीएमसी को कम से कम 30-40 सीटों का सीधा नुकसान हो सकता है। यह स्थिति बंगाल में ‘त्रिशंकु विधानसभा’ या भाजपा की सत्ता के करीब पहुँचने की संभावना को प्रबल कर देगी।
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