कौन समझेगा स्वतंत्रता सेनानी शहीद परिवारों की पीड़ा?–जितेन्द्र रघुवंशी ,राष्ट्रीय महासचिव

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अशोक वर्मा 
मोतिहारी : जिन स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की बदौलत आज हम चैन की श्वास ले रहे हैं, अपने अरमानों के पंखों को उड़ा रहे हैं, सुख सुविधाओं से युक्त आरामदायक जीवनयापन कर रहे हैं, क्या कभी हमने यह सोचा कि उन स्वतंत्रता की बलि वेदी पर चढ़ने वाले सेनानियों के परिवार किस स्थिति में जीवनयापन कर रहे होंगे? कदापि नहीं! उक्त बाते स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार  समिति के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र  रघुवंशी ने कही।उन्होने  कहा कि सेनानियों के लिए सरकारों ने ऊँट के मुंह में जीरा कहावत को चरितार्थ करते हुए कुछ मदद की भी, किन्तु सरकारों ने उनकी अगली पीढ़ी के लिए क्या किया? पहली पीढ़ी तो किसी प्रकार अपने माता-पिता के कर्तृत्व पर गर्व करते हुए जिन्दगी के अन्तिम पड़ाव की ओर बढ़ चली है, किन्तु दूसरी और तीसरी पीढ़ी तो अपने पूर्वजों और आज के तथाकथित राजनेताओं की तुलना करके पूर्वजों के द्वारा उठाए गए कदमों पर ही प्रश्न चिन्ह लगाती दिखाई दे रही है, क्योंकि उनके द्वारा छोड़ी गई आर्थिक बदहाली का दंश वे झेल रहे हैं।
       कहा कि अधिकांश स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों को देखा है और आर्थिक बदहाली का दंश हमने भी झेला है। सरकारें तथा राजनेतागण अपने हितों के संरक्षण के लिए तो पक्ष विपक्ष एक होकर मनमुताबिक कानून बना लेते हैं तथा सुविधा सम्पन्न जीवन यापन करते हैं, पर जिन परिवारों के कारण आज सुख भोग कर रहे हैं, उनकी तरफ किसी का ध्यान भी नहीं जाता, यह दुखद है।
           सबसे दु:खद तो यह है कि देश की राजधानी दिल्ली में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के त्याग और बलिदान से मिली स्वतंत्रता ने जिन्हें प्रधानमंत्री से लेकर बड़े से बड़े पदों पर प्रतिष्ठित होने का अवसर दिया, उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का कोई स्मारक तक सरकारें नहीं बना सकीं। राजनेताओं के नामों पर तो स्मारकों के अम्बार लगे हैं, पर राजनेता बनाने वालों को भुला दिया गया।
                 शहीद स्मारक (वार मेमोरियल) की स्थापना के बाद यह आशा जगी थी कि अब माननीय प्रधानमंत्री जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भी सम्मान बहाल करते हुए “राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मेमोरियल” भी राष्ट्र को समर्पित करेंगे। इस आशय में ५ जून २०१९ से माननीय प्रधानमंत्री जी से आग्रह भी किया जा रहा है, प्रधानमंत्री कार्यालय से यथोचित कार्रवाई भी की गई, पर कार्यपालिका की उपेक्षा से वह फाइल सचिवालयों में ही घूम रही है।
              पिछले दिनों नए संसद भवन का लोकार्पण हुआ, तो पुनः भारत सरकार से आग्रह किया गया है कि अब पुराने संसद भवन को “राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मेमोरियल” घोषित किया जाए और देशभर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के चित्र लगाकर उनका इतिहास प्रदर्शित किया जाए।
           सेनानी परिवारों की प्रथम पीढ़ी भी अब अन्तिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है। जब तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जीवित थे, तब तक तो सम्मान निधि, रेल पास तथा केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं मिल भी जाती थीं, पर उसके बाद तो शायद केन्द्र सरकार को यह भी ध्यान नहीं रहा कि इन सेनानियों के कोई परिवार भी होगा, जिसका दायित्व सेनानी के कंधों पर था। कैसी विडम्बना है कि सम्मान स्वरूप दिया गया उपहार भी सरकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से छीन लेती है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को किसी नौकरी के बदले वेतन नहीं दिया जाता था, बल्कि देश को आजाद कराने के पुरष्कार स्वरूप सम्मान करते हुए सम्मान पेंशन, रेल पास, बस पास तथा अन्यान्य सुविधाओं से पुरस्कृत किया गया था, उनके निधन के साथ ही निर्दयतापूर्वक वह पुरस्कार वापस लेकर उनके परिवारों को दण्डित किया जाता है।
           बिना रोये तो माँ भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती है तो सरकार से यह आशा कैसे की जा सकती है कि अपने आप सेनानी उत्तराधिकारी परिवारों की सुध ले लेगी। पिछले कई वर्षों से स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर स्वतंत्रता सेनानी शहीद उत्तराधिकारी परिवारों के हितों की रक्षा के लिए प्रयासरत है, पर राजनीतिक प्रतिबद्धता से आबद्ध अहंकारी संगठनों के नेता नकारात्मक विचारधारा प्रवाहित कर पराक्रमी भाई बहनों के मंसूबों में पानी फेरने का काम कर रहे हैं।
           अब *हर महीने प्रथम रविवार दस बजे दस मिनट स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों शहीदों के नाम* अभियान के माध्यम से संयुक्त जन शक्ति का सरकार को एहसास कराने का प्रयास प्रभावी सिद्ध हो रहा है। जिन राज्यों ने इस अभियान को गंभीरता से लिया है, वहाँ सेनानी परिवारों के हितों के लिए वांछित कदम उठाए भी जा रहे हैं, पर दिन राज्यों में नेता गिरी हावी है वहाँ का भगवान ही मालिक है। कुछ संगठनों ने माननीय न्यायालय का भी सहारा लिया और पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने सेनानी परिवारों के पक्ष में फैसला भी किया, किन्तु भारत सरकार उसमें बाधक बन गई है। यह समय अपने अपने संगठन की श्रेष्ठता साबित करने का नहीं है, यदि स्वतंत्रता सेनानी शहीद परिवारों के हितों के लिए सरकारें कुछ भी करती हैं तो जो भी संगठन लेना चाहे हमें स्वीकार है, पर अब आवश्यकता है कि सभी संगठनों के द्वारा अपनी सशक्त आवाज अपने अपने क्षेत्र के माननीय सांसदों तक पहुँचाई जाए और उनसे आग्रह किया जाए कि माननीय प्रधानमंत्री जी के नाम इस बावत एक अनुरोध पत्र लिखकर हमारी आवाज उन तक पहुँचाने का प्रयास करें।
          दिल्ली में “राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मेमोरियल” के साथ ही सेनानी उत्तराधिकारी परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए केन्द्र सरकार वह सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराये, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को प्राप्त थीं। इसके साथ ही स्थानीय निकायों, विधानसभाओं, लोकसभा तथा राज्यसभा में उचित प्रतिनिधित्व भी दिया जाना चाहिए।
      समूचे देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठनों तथा सेनानी परिवारों के दर्द को समझने वाले देशभक्त प्रभावशाली लोगों से आग्रह करते हैं कि इस दिशा में सेनानी परिवारों की आवाज को भारत सरकार तक पहुँचाने में मदद करें।
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