मोतिहारी, नरेंद्र झा।मनुष्य को अपने ह्रदय का भाव उत्तम-से-उत्तम बनाना चाहिए। ह्रदय का भाव उत्तम होने पर मनुष्य की सारी चेष्टाएँ अपने-आप उत्तम होने लगती है। उक्त विचार लायंस क्लब ऑफ रक्सौल के अध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता लायन बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।और इसके विपरीत उत्तम-से-उत्तम कर्म भी भाव-दूषित होने के कारण निम्न श्रेणी का बन जाता है।एक मनुष्य यज्ञ,दान,तप,देवताओं की उपासना आदि का अनुष्ठान यदि अपने शत्रु को मारने या दुःख पहुँचाने के उद्देश्य से करता है तो उसके वे यज्ञ,दान, तप,उपासना आदि अनुष्ठान यद्यपि शास्त्र-विहित होने से स्वरुपस्तः सात्त्विक हैं,फिर भी दूसरे का अनिष्ट करने का दुर्भाव होने के कारण तामसी हो जाते हैं।श्रद्धा,प्रेम,दया, क्षमा, शान्ति,समता,संतोष,सरलता, ज्ञान,वैराग्य,निर्भयता,आंतरिक पवित्रता, निष्कामता आदि – ये सब हृदय के उत्तम भाव हैं।ये सभी आत्मा का उद्धार करने वाले हैं।जिस क्रिया के साथ इनका संयोग हो जाता है,वह क्रिया भी उत्तम-से-उत्तम बन जाती है।जब हम किसी के साथ व्यवहार करें,उस समय हमें उसके साथ प्रेम,विनय, निर्भिमानता,उदारता और निष्काम भाव आदि से युक्त होकर व्यवहार करना चाहिए।मनुष्य का कर्तव्य है कि अपने प्रेमी मित्र को बुरे मार्ग से रोक कर अच्छे मार्ग पर चलाए,उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपाए।सर्वोत्तम भाव तो यह है कि सब कुछ परमात्मा का स्वरूप है।जैसे स्वप्न में मनुष्य जिस संसार को देखता है,वह उसके मन का संकल्प होने के कारण उससे अभिन्न है,उसी प्रकार यह सारा संसार ईश्वर का संकल्प होने के कारण उनसे अभिन्न है अर्थात् ईश्वर का ही स्वरूप है।इस भाव से देखने वाला मनुष्य उच्चकोटि का माना जाता है।सारा संसार एक परिवार है,हमें सदैव याद रखना चाहिए।मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।
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