समुद्र के बीच बना है भगवान शिव का अनोखा मंदिर, जानिए इसका अनोखा रहस्य

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भारत देश अपने धार्मिक स्थलों, पौराणिक कथाओं और अलौकिक रहस्यों से भरा पड़ा है। हमारे देश में भगवान शिव के अनगिनत और ऐतिहासिक मंदिर मौजूद हैं, जिनमें से हर एक की अपनी अनूठी महिमा और चमत्कारी मान्यता है। लेकिन गुजरात के भावनगर जिले के कोलियाक तट पर अरब सागर के बीचों-बीच स्थित ‘निष्कलंक महादेव मंदिर’ (Nishkalank Mahadev Temple) की बात ही निराली है। यह दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा शिव मंदिर है, जहां भक्त अपनी मर्जी या अपनी सुविधानुसार दर्शन करने नहीं जा सकते, बल्कि खुद देवों के देव महादेव अपने भक्तों के आने और दर्शन करने का समय तय करते हैं। समुद्र के बीचों-बीच पानी की उठती और गिरती लहरों के बीच स्थित इस मंदिर में हर रोज एक ऐसा प्राकृतिक चमत्कार होता है, जिसे देखकर बड़े-बड़े आधुनिक वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। महाभारत काल से जुड़े इस अलौकिक मंदिर में दिन में दो बार ऐसा चमत्कार होता है कि विशाल समुद्र खुद महादेव के शिवलिंगों का जलाभिषेक करने के बाद रास्ता छोड़ देता है। आइए जानते हैं कि इस रहस्यमयी मंदिर का क्या इतिहास है और आखिर क्यों यहां केवल ज्वार-भाटा के समय ही दर्शन संभव हो पाते हैं।

#1 समुद्र के बीचों-बीच स्थापित हैं 5 स्वयंभू शिवलिंग: जानिए महाभारत काल से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार, निष्कलंक महादेव मंदिर की स्थापना किसी साधारण मनुष्य ने नहीं, बल्कि महाभारत के युद्ध के बाद स्वयं पांडवों ने की थी। कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में अपने ही भाइयों (कौरवों) और संबंधियों का वध करने के बाद पांडव भारी पश्चाताप और पापबोध से ग्रसित थे। अपने ऊपर लगे गोत्र हत्या और स्वजन हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण से उपाय पूछा। श्री कृष्ण ने पांडवों को एक काली गाय और एक काला ध्वज देकर यात्रा पर निकलने को कहा और निर्देश दिया कि जिस स्थान पर जाकर गाय और ध्वज दोनों का रंग पूरी तरह सफेद हो जाए, वहीं उन्हें महादेव की तपस्या करनी होगी। कई वर्षों की लंबी यात्रा के बाद जब पांडव गुजरात के भावनगर स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे, तो काली गाय और ध्वज दोनों सफेद रंग में बदल गए। इसके बाद पांडवों ने समुद्र तट के पास घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने पांडवों के पापों को निष्कलंक (पाप रहित) कर दिया। इसके बाद पांडवों ने वहां पांचों भाइयों के प्रतीक स्वरूप 5 स्वयंभू शिवलिंगों और उनके सामने वर्गाकार मंच (Platform) की स्थापना की।

#1 समुद्र की लहरों का अनोखा रहस्य: दिन में दो बार पूरी तरह जलमग्न हो जाता है मंदिर

निष्कलंक महादेव मंदिर का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक रहस्य यह है कि यह मंदिर तट से लगभग 1.5 किलोमीटर अंदर अरब सागर की लहरों के बीच एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है। दिन के समय जब समुद्र में उच्च ज्वार (High Tide) आता है, तो समुद्र का जलस्तर अचानक बहुत तेजी से बढ़ने लगता है। देखते ही देखते मंदिर का पूरा प्रांगण और पांचों शिवलिंग पानी के अंदर 10 से 15 फीट तक जलमग्न हो जाते हैं। उस दौरान मंदिर के ऊपर लगा केवल 20 फीट ऊंचा मुख्य ध्वज (Flag) ही समुद्र के पानी से ऊपर दिखाई देता है। जब तक ज्वार का प्रभाव रहता है, तब तक कोई भी इंसान मंदिर तक पहुंचने की हिम्मत नहीं कर सकता। लेकिन जैसे ही दोपहर या शाम के समय भाटा (Low Tide) की शुरुआत होती है, समुद्र का पानी चमत्कारी रूप से पीछे हटने लगता है और तट से मंदिर तक जाने का पूरा रास्ता साफ हो जाता है। इसी वजह से कहा जाता है कि जब समुद्र रास्ता देता है और महादेव अनुमति देते हैं, तभी भक्त पैदल चलकर मंदिर तक दर्शन के लिए पहुंच पाते हैं।

#1 ज्वार-भाटा के समय के अनुसार तय होते हैं दर्शन: पंडित और नाविक देते हैं सही समय की चेतावनी

निष्कलंक महादेव मंदिर में दर्शन का समय पूरी तरह से चंद्र कलाओं और समुद्र के ज्वार-भाटा के प्राकृतिक चक्र पर निर्भर करता है। मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय पंडित हर दिन समुद्र के जलस्तर घटने और बढ़ने के सटीक समय का बोर्ड लगाते हैं। जब दोपहर के समय समुद्र का पानी पीछे हटता है, तब हजारों की संख्या में आए श्रद्धालु नंगे पैर समुद्र की गीली रेत और दलदल पर 1.5 किलोमीटर की दूरी तय करके मंदिर पहुंचते हैं। भक्तों को शिवलिंग पर जल चढ़ाने, पूजा-अर्चना करने और ध्वजा रोहण करने के लिए लगभग 3 से 4 घंटे का समय मिलता है। जैसे ही शाम को दोबारा उच्च ज्वार का समय नजदीक आता है, मंदिर के पुजारी शंखनाद करके और लाउडस्पीकर से घोषणा करके सभी श्रद्धालुओं को तुरंत किनारे पर वापस लौटने की हिदायत देते हैं। अगर कोई व्यक्ति समय रहते वापस नहीं आता, तो वह समुद्र की उफनती लहरों के बीच फंस सकता है।

#1 भाद्रपद अमावस्या पर लगता है भव्य ‘भादरवी मेला’: दूर-दूर से आते हैं लाखों श्रद्धालु

यद्यपि निष्कलंक महादेव मंदिर में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या (Bhadarvi Amavasya) के दिन यहां एक ऐतिहासिक और विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इस पावन अवसर पर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में शिवभक्त और साधु-संत एकत्रित होते हैं। मान्यता है कि भाद्रपद अमावस्या के दिन समुद्र के पानी में स्नान करने के बाद निष्कलंक महादेव के दर्शन करने और अपने परिजनों की अस्थियां या भस्म समुद्र में प्रवाहित करने से मृत आत्माओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस विशेष दिन पर तत्कालीन भावनगर के पूर्व राजपरिवार के सदस्यों द्वारा मंदिर के मुख्य स्तंभ पर पहली विशाल ध्वजा फहराई जाती है, जिसके बाद ही आम जनता पूजा शुरू करती है।

#1 आस्था, प्रकृति और विज्ञान का बेमिसाल संगम है यह निष्कलंक धाम

आज के दौर में जहां मनुष्य हर चीज को तकनीक से नियंत्रित करने का दावा करता है, वहीं निष्कलंक महादेव मंदिर यह साबित करता है कि प्रकृति और ईश्वर की सत्ता के आगे इंसानी नियम बौने हैं। अरब सागर की लहरें सदियों से रोज नियमपूर्वक आकर भगवान शिव के पांचों शिवलिंगों का प्राकृतिक जलाभिषेक (Abhishekam) करती हैं और फिर भक्ति भाव से पीछे हट जाती हैं। इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनने के लिए दुनिया भर से पर्यटक और शोधकर्ता भावनगर पहुंचते हैं। यदि आप भी महादेव के इस अनोखे और चमत्कारी रूप के दर्शन करना चाहते हैं, तो भावनगर के कोलियाक तट की यात्रा करके इस अदम्य आध्यात्मिक अनुभव को अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।

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