अल्लाह जानता है मोहम्मद का मर्तबा से गूंजा शहर

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  • यौमे पैदाइश पर शिद्दत से याद किए गए पैगम्बर मोहम्मद
  • पूरी दुनिया के लिए रहमत बनकर कर आए थे हजरत मोहम्मद
  • निकाला गया मोहम्मदी जुलूस, हजारो की संख्या में अकीदतमंदों ने की शिरकत
अशोक वर्मा
मोतिहारी :  अल्लाह जानता है मोहम्मद का मर्तबा…की गूंज से रविवार को पूरा शहर गूंजता रहा। पैग़ंबर -ए- इस्लाम हजरत मोहम्मद के यौम -ए- पैदाइश को ईद -ए- मिलादुन्नबी के रूप में मनाया और अकीदतमंदो ने। जगह-जगह जुलूस ए मोहम्मदी निकाला। जुलूस मदरसा गौसिया नूरिया रघुनाथपुर, बलुआ, बरियारपुर, राजा बाजार, अगरवा चौक, मीना बाजार चौक, ज्ञान बाबू चौक, जान पुल चौक, चांदमारी चौक होते हुए बलुआ चौक पर पहुंचा। जलूस में रसूल के दीवानों ने काफी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और रस्में पूरी की। इस दौरान बलुआ मस्जिद के पूर्व इमाम मौलाना मोहम्मद जैनुद्दीन खान से बातचीत के दौरान बताया कि आज ही के दिन आखरी पैगंबर इस दुनिया में तशरीफ लाए थे कहा कि नबी ने पूरी दुनिया को प्रेम सद्भाव और भाईचारे की तालीम दी। पूरी दुनिया के लिए वे रहमत बनकर आए और उनका जीवन सबों के लिए अनुकरणीय है। वही मस्जिद ए गौसिया नूरिया के मौलाना इमरान आलम ने नबी की जिंदगी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नबी ने सामाजिक कुर्तियां और आपसी नफरत से इंसानी समाज को मुक्ति दिलाई। बलुआ मस्जिद के इमाम मोहम्मद रजाउल्लाह नक्शबंदी ने कहा कि तमाम जहानों के लिए रहमत बनकर आए इंसानों को जीने का सलीका प्रदान किया। वही जुलूस ए मोहम्मदी के दौरान नारे तकबीर नारे रिसालत का नारा बुलंद होता रहा। बलुआ चौक पर जलूस का समापन हुआ और वतन के अमन चैन व सलामती की दुआ मांगी गई…गौरतलब हो कि हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहे वसल्लम ने ही इस्लाम धर्म की स्थापना की। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैह वसल्लम ही इस्लाम के आखिरी नबी है उनके बाद अब कयामत कोई नबी नहीं आने वाले हैं। मुहम्मद साहब का जन्म 12 रबीउल अव्वल 571 ई.वी. को मक्का शहर में हुआ था… जुलूस -ए- मोहम्मदी के दौरान प्रशासनिक विधि व्यवस्था अलर्ट मोड में दिखी तथा जगह-जगह पर पुलिस के जवान तैनात किए गए थे। उक्त मौके पर अमजद रजा अमजदी, मासूम रज़ा मिस्बाही, मौलाना कौशर नूरी, हफ़ीज़ आफताब साहब, एनाम खान, सईदुल होदा, सद्दाम हुसैन, मुजाहिद हुसैन, जाहिद हुसैन, जफर आलम, दाऊद इकबाल, ताहिर हुसैन मोहम्मद साहब, शौकत आलम, जहिर आलम, शाहमोहम्मद साहब, आसिफ रज़ा सहित सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद थे।
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