एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा ऑख हैरान है क्या शख्स जमाने से उठा : परवीन शाकिर

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  • बिहार के नामवर अधिवक्ता व वरिष्ठ राजनेता उमाकांत शुक्ला का देहावसान 
  • राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा अर्जित की
  • बिहार के जाने-माने संस्कृति कर्मी एवं चंपारण सांस्कृतिक महोत्सव के सचिव संजय कुमार पाण्डेय ने श्रद्धांजलि स्वरूप अपना उद्गार व्यक्त किया
अशोक वर्मा
मोतिहारी : जज्बात और भावनाओं को अपनी कलम की रोशनाई से बखूबी उकेरने वाली मशहूर शायरा परवीन शाकिर की गज़ल का मतला तब स्मृति-पटल पर उभर आया, जब यह मनहूस खबर मिली कि चंपारण के राजनैतिक, सामाजिक- योद्धा एवं नामचीन व बिहार के कद्दावर अधिवक्ता आदरणीय उमाकांत शुक्ला ने सांसारिक लोक को अलविदा कह दिया। मन और कानों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। मगर, यह सच था कि वे सदा के लिए अपने प्रियजनों से विदा ले ईश्वर की खूबसूरत दुनिया में चले गए हैं। खबर मिली कि पटना स्थित अपने निवास में सोमवार की शाम उन्होंने अंतिम साॅस ली।पूर्वी चंपारण के बाबा सोमेश्वरनाथ की नगरी अरेराज अनुमंडल के संग्रामपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत भवानीपुर गांव में वर्ष 1941 को एक सामान्य परिवार में जन्में उमाकांत शुक्ला दो भाई एवं चार बहनों में सबसे बड़े थे। जिला विधिक संघ के वरीय सदस्य आदरणीय रामाकांत शुक्ल इनके अनुज हैं। पढ़ने में अत्यंत मेधावी उमाकांत ने पटना विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ लाॅ ( बी.एल.) की डिग्री हासिल की। हैरानी की बात रही कि उस वक्त सरकारी नौकरी पा लेना बिल्कुल सामान्य सी बात थी, तब भी इन्होंने नौकरी के लिए सोंचा तक नहीं और ना कभी प्रयास हीं किए। व्यक्ति जीवन में अथवा कैरियर में इस तरह के फैसले तभी लेता है, जब अपनी रुचि के अनुरूप उसे अपनी प्रतिभा, अपनी काबलियत पर हद से ज्यादा भरोसा हो। इसी भरोसे के तहत उमाकांत शुक्ला ने वकालत का पेशा चुना और वर्ष 1964 में मोतिहारी व्यवहार न्यायालय में अपने पेशे की शुरुआत की। आज के दौर से विपरीत यह वह दौर था, जब वक़ालत के पेशे से शहर के रईस, विद्वान, कद्दावर राजनेता एवं सैकड़ो बीघा जोतने वाले जमींदार श्रेणी के बेहद पढ़े- लिखे लोग जुड़े थे, जिनकी तूती इस पेशा एवं समाज में बोलती थी। उन प्रतिभावान व अत्यंत सफल व नामचीन वकीलों की जमात में रहकर उमाकांत ने अपनी प्रखरता,विद्वता की बदौलत बहुत कम दिनों में हीं खुद को एक नामवर वकील के तौर पर स्थापित कर लिया। इस नाम ने उन्हें इज्जत, शोहरत और आवश्यकतानुसार दौलत से लबालब कर दिया। गोविंदगंज के नगदहाॅ गांव के पंडित बागेश्वर पाण्डेय की सुपुत्री मनोरमा पाण्डेय से इनकी शादी हुई, जिनसे उन्हें दो पुत्र और पाॅच पुत्रियाॅ हुईं। उमाकांत सिर्फ अपने बच्चों के पिता नहीं थे, बल्कि उनके भाई और बहनें भी उनके पुत्र- पुत्री के समान हीं थे। सभी भाई – बहनों को पढ़ा- लिखा योग्य बनाया तथा खुद उनके शादी- व्याह बड़े धूम-धाम से किए। अपने बच्चों की परवरिश का उन्होंने खास ख्याल रखा। पांचों पुत्रियों एवं दोनों पुत्रों को उच्च शिक्षा दिलाई व कैरियर चुनने का निर्णय उनपर छोड़ दिया। कैरियर चयन के लिए कभी  बच्चों पर दबाव नहीं बनाया। कभी उन्हें डाॅट तक ना लगायी, किसी बात पर नाराज हुए, तो प्यार से उन्हें समझा दिया। उनके ज्येष्ठ पुत्र राजेश रंजन पटना उच्च न्यायालय के नामवर अधिवक्ता हैं। राजेश रंजन उमाकांत शुक्ला के असली उतराधिकारी हैं। उनके व्यक्तित्व में कई ऐसी विशेषताएँ हैं, जो विरले कहीं मिलती हैं। अपनी मातृभूमि, अपने लोग और नाते – रिश्तेदारों को राजेश रंजन हद से ज्यादा चाहते हैं। अपने पूरे परिवार में राजेश अपने मामा व मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के पूर्व कुलपति प्रो.( डाॅ.) वीरेन्द्र नाथ पाण्डेय के बाद दूसरी शख्सियत हैं, जिन्हें ईश्वर ने संपूर्ण मानवीय गुण-तत्त्व से युक्त कर इस धराधाम पर भेजा है।
      वकालत पेशे के दौरान उमाकांत शुक्ला की लोकप्रियता महज कुछ वर्ष में हीं इस कदर बढ़ गई कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें पहलीबार वर्ष 1969 में गोविंदगंज विधानसभा से अपना उम्मीदवार बना दिया। वे सीपीआई (एम) के टिकट पर गोविंदगंज से क्रमश: 1980 एवं 1985 में विधानसभा चुनाव लड़े, मगर कांग्रेस के गढ़ को भेद ना सके और बहुत कम मतो के अंतर से चुनाव हारते गए। फिर भी पार्टी ने उन्हें पूरी इज्जत दी। वे भाकपा स्टेट कमिटी के मेंबर थे तथा पार्टी के जिला सचिव भी रहे। भाकपा की नीतियों के अनुयाई उमाकांत ने हमेशा गरीब,शोषित व पीड़ितों की आवाज बुलंद की और सर्वहारा वर्ग के उत्थान के लिए सदैव संघर्ष किया। मोतिहारी व्यवहार न्यायालय में उन्होने 1983 तक वकालत की। जनवरी 1984 में वे पटना चले गए,तब उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में वक़ालत शुरु की। देखते- देखते वे वकालत की दुनिया के बड़े नाम बन गए, जिन्होंने कई बड़े और पेचीदा मुकदमों में अपने मुवक्किल को मुक्कमल जीत दिलाई। उमाकांत ने ऑल इंडिया लाॅयर यूनियन ( AILU) ,बिहार स्टेट के अध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया। वकालत की दुनिया में वे अब राष्ट्रीय स्तर की शख्सियत के रुप में गिने जाने लगे। तीन – तीन बार विधानसभा चुनाव हारने के बाद राजनीति में तो वे ज्यादा सक्रिय नहीं रहे। मगर भाकपा की नीतियाॅ- सिद्धांत उनके व्यक्तित्व पर सदैव हावी रहीं। जीवन में नैतिक मूल्यों के हिमायती रहे उमाकांत बेहद शांतचित्त, मृदुभाषी, गंभीर एवं अनुशासित व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व का असर उनके पेशे में स्पष्ट तौर पर दिखता है, क्योंकि उन्होंने कभी गलत मुकदमों की पैरवी नहीं की और सही न्याय के लिए अंतिम सीमा को पार भी कर गए। उनका जीवन उच्चतर सिद्धांत व मानवीय गुण- तत्व से परिपूर्ण था। इसलिए अपने पेशे के प्रति उनमें हद से ज्यादा जुनून था, अंतिम काल तक वे असीम ऊर्जा से भरे रहे। साॅसों की डोर टूटने तक वे पटना उच्च न्यायालय में उसी लगन, ईमानदारी एवं सेवाभाव से अपने वक़ालत के प्रिय पेशा से जुड़े रहे।
     उमाकांत शुक्ला का जीवन महाभारत के अर्जुन से कई मायनों में मिलता- जुलता दिखता  है। अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ली, फिर भगवान इंद्र की सेवा एवं भगवान शिव की तपस्या से शस्त्र- शास्त्र में निपुणता हासिल की। उसी प्रकार उमाकांत ने पढ़ाई में विद्वता हासिल की,खुद को नैतिक मूल्य- सिद्धांत के दायरे में बाॅधा और कम्यूनिज्म के सिद्धांतों से अभिप्रेरित हो सिर्फ एक धारा की राजनीति की। उन्होंने अपने वकालत पेशा को इन्ही मूल्य- सिद्धांत के अनुसार रचा, गढ़ा और अपने पेशे में वे ऐतिहासिक बुलंदियों को पार कर गए।उमाकांत शुक्ला! एक ऐसी शख्सियत। जिसके खामोश और शालीनता भरे व्यक्तित्व में आज भी उतनी हीं चमक थी, उतना हीं आकर्षण था। उमाकांत शुक्ल आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो अपना कैरियर सोंच- समझकर चुनता है और सफ़लता के नये कीर्तिमान स्थापित कर इतिहास रच जाता है। कैरियर हो अथवा व्यक्तिगत जीवन। अमरत्व प्राप्त कर किवदंती बनने के लिए सिर्फ डिग्री की योग्यता काम नहीं आती, बल्कि जीवन के अनुभव,सिद्धांत, धैर्य, अदम्य साहस, सहनशीलता और नैतिक मूल्यों को समाहित कर खुद को पकाना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
    उमाकांत शुक्ला का संपूर्ण जीवन परिवार, समाज एवं राष्ट्र को समर्पित रहा। वे सच्चे अर्थो में किसी महापुरुष की श्रेणी के संत समान अद्भुत शख्सियत थे।
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