आज के ही दिन 24 अगस्त को बेतियाराज के मैदान में 8 देश भक्त शहीद हुए थे

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  • जलियांवाला बाग नरसंहार का नजारा था ।
अशोक वर्मा
मोतिहारी : 24 अगस्त को चंपारण के स्वतंत्रता संग्राम  इतिहास का काला अध्याय के रूप में माना जाता है। मेहसी के कुछ मुखवीरों ने मुजफ्फरपुर पुलिस छावनी में जाकर मुखवीरी की थी जिससे अंग्रेजी सरकार के  क्रूर टॉमियो ने मेहसी में आकर तांडव किया था और दो देशभक्तों को शहीद करके बेतियां के लिये प्रस्थान किया था। मुजफ्फरपुर के छावनी में उन्हें खबर मिली थी कि बेतिया में आजादी के दीवानो  का बड़ा प्रदर्शन होने जा रहा है । पुलिस के जवान बेतिया पहुंचे अभी राजडयोढ़ी के मैदान में प्रदर्शन की तैयारी  चल हीं रही थी, सारे क्रांति वीर  इकट्ठे हो हीं रहे थे,  गांवो एवं शहर के विभिन्न  मुहल्लो  से देशभक्त तिरंगा लिए  पहुंच हीं रहे थे  तब तक के अंग्रेज सिपाहियो ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और ताबड़तोड़ लाठियां बरसाने  लगे। स्वतंत्रता सेनानियों को लहूलुहान कर दिया  चारों तरफ  खून बहने लगे।चीख ,पुकार ,चित्कार ,के बीच लहूलुहान देशभक्त भारत माता की जय कार का नारा लगाते  रहे। कितने सेनानी  गिरकर  हाथों में झंडे लिए हुए थे । अंग्रेजों ने जरा भी रहम नहीं की। उन्हें तो दहशत फैलाकर वीरो के मनोवल को तोडना था।सिपाही तांडव और खूनी खेल खेलकर वे वहां से कूच कर गए ।आठ देशभक्त शहीद हुए और सैकड़ों बुरी तरह घायल हुए लेकिनआजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए । गांधी जी ने करो या मरो का जो नारा दिया था, सभी सेनानी गांधी जी के उस नारे को सफल करने मे जान हथेली पर रखकर कूद पडे थे। शहीद 8 देशभक्तों में 12 वर्ष के दो किशोर भी थे। 1942 की वह लडाई  और कुर्बानी निर्णायक  साबित हुई। देश आजाद हुआ ।बेतिया के शहीद स्वतंत्रता सेनानियों की सूधी 1980 के दशक मे सरकार एवं प्रशासन ने ली और उन आठ देशभक्तों की याद  में  शहीद पार्क बना ।बेतिया  नगर भवन के पास बना वह शहीद पार्क आज भी शान से अमर वीर शहीदों की गाथा  कह रहा है ।लोग बड़े ही चाव और श्रद्धा से वहां जाकर वीर शहीदों को नमन करते हैं। देश के बड़े-बड़े राजनेता जब भी बेतिया आते हैं तो वहां निश्चित ही पहुंचकर माल्यार्पण करते हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी वहां शहीदो की मूर्ति पर पुष्प अर्पित कर नमन किए हैं।
वीर शहीदों की गाथा तो सभी गाकर गौरवान्वित  होते हैं लेकिन आजादी के बाद शहीदों का परिवार किस स्थिति में है  इसकी पड़ताल न तो सरकारी स्तर पर ही कोई करता है न हीं  निजी स्तर पर ही होता है। शहीद परिवार के कितने लोग बर्बाद हो गए किसी ने उनकी सुधि नहीं ली। बेतिया में शहीद हुए 8 देशभक्तों में कुछ परिवार ऐसे है जिन्हें सरकारी स्तर पर किसी तरह का सहयोग नहीं मिल पाया , तकनीकी त्रुटि भी रही। कहीं पिता का नाम कहीं पति का नाम छूटा।  कई ऐसे परिवार की भी जानकारी मिली जिनके घर के लोग आज भी दैनिक मजदूरी करके जीते हैं ।यह दुर्भाग्य है 75 वर्ष के आजाद मुल्क का जहां शहीदों को  मान सम्मान नहीं मिल पाया।हां,उनकी मूर्ति लग गई ,उसपर मालयार्पण सभी करते  हैं तालियां खूब बजाते हैं शहीदों पर लंबे चौड़े भाषण होते हैं लगता है कि कितने महान देशभक्त हैं सभी ,लेकिन  शहीद परिवार की सुधि कोई नहीं लेता । मेहसी में जब एक मजदूर बुंदेल राउत शहीद हुये थे तो उनकी पत्नी प्रसूता थी दुसरे शहीद रामअवतार साह थे, आज तक उनकी एक मूर्ति तक मेहसी में नहीं लगी।
 बेतिया में कई ऐसे शहीद हुए हैं जिनके घरों की माली हालत आज भी बहुत खराब है।बेतिया मे शहीद हुये तीन  परिवार से लेखक को मिलने का मौका मिला है।एक पुरानी गुदरी के गणेश राव  दूसरा मझौलिया  का और तीसरा गोड़ा सेमरा का शहीद परिवार।गणेश राव के पौत्र
 मजदूर है,मझौलिया के शहीद की बहुभी मजदूर है।गोडासेमरा का शहीद परिवार राशन डीलर है। यही है स्वतंत्र भारत में  शहीदों का सम्मान।लाखो रु वेतन और टीए मद का उठाने वाले राजनेता शहीदो के नाम पर खूब तालियां बजवाते हैं,लेकिन किसी ने भी शहीदों के घर जाकर नहीं झांका है कि उनके घर मे चूल्हा जलता है कि नहीं ।चंपारण सत्याग्रह  शताब्दी वर्ष के नाम पर करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा दिया गया। चंपारण में तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी प्रोग्राम हुआ । उससे चंपारण को क्या मिला ? शहीद परिवार या स्वतंत्रा सेनानी परिवार की किसी ने भी सूधी नहीं ली ।आज चंपारण के लगभग सभी स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत हो चुके हैं । स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी पेंशन की मांग राष्ट्रीय स्तर पर कई वर्षों से उठी हुई है,लेकिन सरकार के गले से नीचे उतर नही रही है ।कांग्रेस  काल मे इंदिरा गांधी ने आजादी के 25 वीं वर्षगांठ पर स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लागू की थी । वर्तमान समय लगभग सभी स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत हो चुके हैं । बहुत से स्वतंत्रता सेनानी परिवार की माली हालत अति दयनीय  हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के दिवंगत होने के बाद उन्हें मिलने वाली पेंशन राशि वैसे भी सरकार के पास पड़ी हुई है ,उसे भी अगर उत्तराधिकारियों के बीच दे दिया जाता तो बहुत से सेनानी परिवार का कल्याण हो जाता।
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