सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद 32 वर्षीय हरीश राणा के परिवार की याचिका को स्वीकार कर लिया है। हरीश राणा साल 2011 में एक दुर्घटना (सीढ़ियों से गिरने) के बाद से ही ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में थे। पिछले 13 वर्षों से वे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर थे और उनके ठीक होने की कोई चिकित्सीय संभावना नहीं बची थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु:
गरिमा के साथ मृत्यु: जस्टिस की बेंच ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 न केवल गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, बल्कि इसमें ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ भी शामिल है, खासकर जब जीवन केवल मशीन के सहारे टिका हो।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट: अदालत ने एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसने पुष्टि की कि राणा के मस्तिष्क में अब चेतना लौटने की कोई उम्मीद नहीं है।
पैसिव यूथनेशिया (Passive Euthanasia): अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सक्रिय हत्या नहीं है, बल्कि उस चिकित्सा उपचार या लाइफ सपोर्ट को बंद करना है जो कृत्रिम रूप से जीवन को बढ़ा रहा था।
परिवार का संघर्ष: हरीश के बुजुर्ग माता-पिता लंबे समय से यह गुहार लगा रहे थे कि उनके बेटे को इस असीमित पीड़ा से मुक्ति दी जाए। उन्होंने अदालत से कहा था कि हरीश केवल सांसें ले रहा है, लेकिन वह जीवित नहीं है। परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए अदालत ने मानवीय आधार पर यह निर्णय लिया।
भारत में कानून की स्थिति: भारत में अरुणा शानबाग मामले के बाद से पैसिव यूथनेशिया को कानूनी मान्यता मिली थी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ‘लिविंग विल’ (Living Will) और सम्मानजनक मृत्यु को वैध माना था। हरीश राणा का मामला इसी कानून को और मजबूती प्रदान करता है।
क्या होता है ‘पैसिव यूथनेशिया’?
यह वह स्थिति है जब किसी मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) जानबूझकर रोक दिया जाता है, ताकि उसे प्राकृतिक रूप से मृत्यु प्राप्त हो सके। यह ‘एक्टिव यूथनेशिया’ (जहर का इंजेक्शन देना) से अलग है, जो भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है।
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