कुपोषण के खिलाफ जंग में बिहार का ‘वैशाली मॉडल’ बना पथप्रदर्शक

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  • एनआरसी के हर मानक मे राज्य में सबसे आगे वैशाली
  • 93 प्रतिशत क्योर रेट है एनआरसी का 
वैशाली। “शुरुआत में लगा कि सरकारी अस्पताल में सिर्फ दवा मिलेगी, लेकिन यहाँ तो मेरे बच्चे के खाने से लेकर उसके खेलने तक का ध्यान रखा गया। सबसे बड़ी बात यह रही कि डॉक्टरों ने मुझे सिखाया कि घर की चीजों से घर के चूल्हे पर ही पौष्टिक आहार कैसे तैयार होता है। आज मेरा बच्चा स्वस्थ है और यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं।”
लालगंज के जलालपुर की रहने वाली चंचल कुमारी की यह भावुक आवाज आज बिहार के उन हजारों परिवारों की उम्मीद बन गई है, जिनके मासूम कुपोषण की अंधेरी गलियों में खोए थे। बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की हालिया प्रदर्शन रिपोर्ट में वैशाली जिला पोषण पुनर्वास केंद्र को पूरे सूबे में प्रथम स्थान मिलना महज एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में आए एक क्रांतिकारी बदलाव का शंखनाद है।
राज्य स्वास्थ्य समिति में शिशु स्वास्थ्य के उपनिदेशक विमलेश कुमार का मानना है कि वैशाली ने यह साबित किया है कि कुपोषण जैसी सामाजिक-आर्थिक समस्या से लड़ने के लिए केवल बजट काफी नहीं है, बल्कि संवेदना और ‘माइक्रो-प्लानिंग’ की जरूरत है। यहाँ की 93 प्रतिशत के साथ उच्च रिकवरी दर राज्य के अन्य जिलों के लिए एक मानक स्थापित करती है।
डाइट और डेटा की जुगलबंदी:
एनआरसी के भीतर का वातावरण किसी मेडिकल वार्ड से कहीं अधिक ‘लर्निंग हब’ जैसा है। यहाँ कार्यरत  पोषण विशेषज्ञ केशव कुमार और अर्चना कुमारी बताती हैं कि अति कुपोषित बच्चों की रिकवरी के लिए वैज्ञानिक प्रोटोकॉल का पालन अनिवार्य है। यहाँ एफ-75 और एफ-100 जैसे चिकित्सीय आहार को बच्चे की तत्कालीन मेटाबॉलिक स्थिति के अनुसार दिया जाता है। डीपीसी विकास कुमार बताते हैं कि वैशाली की सफलता दर अधिक होने का कारण यहाँ का ‘फॉलो-अप मॉड्यूल’ है। डिस्चार्ज के बाद भी बच्चे की सेहत का डेटा ट्रैक किया जाता है और समय-समय पर उसे पुनः जांच के लिए बुलाया जाता है, जिससे ‘रिलैप्स’ (दोबारा कुपोषित होने) की संभावना न्यूनतम हो गई है।
गांव लौटकर माताएं बन रही ‘पोषण दूत’:
सिविल सर्जन डॉ श्यामनंदन प्रसाद  कहते हैं कि कुपोषण से लड़ना एक वैज्ञानिक चुनौती भी है और सामाजिक भी। हमने वैशाली में डाइट प्रोटोकॉल के साथ-साथ ‘कम्युनिटी एम्पावरमेंट’ पर ध्यान केंद्रित किया। हमारा ‘फॉलो-अप मॉड्यूल’ यह सुनिश्चित करता है कि डिस्चार्ज के बाद भी बच्चा सुरक्षित रहे। वैशाली का एनआरसी मॉडल साबित करता है कि संसाधनों का सही प्रबंधन और निरंतर निगरानी बड़े बदलाव ला सकती है।
वह कहते हैं कि यह केंद्र केवल बच्चों का वजन ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उन माताओं को प्रशिक्षित कर रहा है जो अपने गांव लौटकर ‘पोषण दूत’ की भूमिका निभा रही हैं। वैशाली की यह सफलता कहानी इस बात का प्रमाण है कि जब सरकारी मशीनरी संवेदना के साथ काम करती है, तो परिणाम सांख्यिकीय तालिकाओं से निकलकर बच्चों की खिलखिलाहट में गूंजने लगते हैं।
प्रशासनिक विजन: फाइलों से फील्ड तक का सफर
वैशाली की इस कामयाबी की पटकथा आईसीडीएस और स्वास्थ्य विभाग की आपसी जुगलबंदी से लिखी गई है। इस संबंध में जिला सामुदायिक उत्प्रेरक निभा रानी सिन्हा बताती हैं कि आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से एक ऐसा ‘रेफरल लूप’ तैयार किया, जिससे कुपोषित बच्चों की पहचान और भर्ती की प्रक्रिया पारदर्शी हो गई। स्वास्थ्य विभाग ने यह सुनिश्चित किया कि भर्ती रहने के दौरान माताओं की मजदूरी के नुकसान की भरपाई (प्रोत्साहन राशि 100 रुपए) का भुगतान समय पर हो, ताकि गरीबी इलाज के आड़े न आए।
तीन बड़ी खूबियों से राज्य के लिए मॉडल:
एनआरसी नीति-निर्माताओं के लिए वैशाली आज एक ‘केस स्टडी’ बन चुका है। राज्य स्तर पर इस मॉडल की तीन बड़ी खूबियां भी चर्चा में हैं। अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार 65 प्रतिशत एडमिशन,70 प्रतिशत बेड ऑक्यूपेंसी और 93 प्रतिशत क्योर रेट शामिल है। अप्रैल से अक्टूबर 2025 तक वैशाली में वैशाली एनआरसी में जहां 234 कुपोषित बच्चों की भर्ती हुए तो सिर्फ दिसंबर माह में यहां 42 बच्चों को भर्ती किया गया।
कुपोषण सुधार का दस्तावेज है एनआरसी वैशाली: 
वैशाली एनआरसी की यह उपलब्धि महज एक सरकारी रैंकिंग नहीं, बल्कि बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था में आए उस गुणात्मक सुधार का दस्तावेज है जहाँ ‘मरीज’ को अब ‘इंसान’ और ‘इलाज’ को ‘सेवा’ के चश्मे से देखा जा रहा है। वैशाली ने यह मिथक तोड़ दिया है कि कुपोषण एक लाइलाज सामाजिक नियति है; उसने साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक भागीदारी का मेल हो, तो संसाधनों की सीमाएं कभी बाधा नहीं बनतीं।
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